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मोहम्मदपुर कुन्हारी की बेटी डॉ. शहजादी अंसारी का बड़ा अकादमिक मुकाम, ICSSR पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप के लिए हुआ चयन,, 1947’ की दर्दभरी दास्तान अब IIT रुड़की में होगी रिसर्च का हिस्सा,, IIT रुड़की में करेंगी शोध—भारत विभाजन की स्मृतियों, साहित्य, सिनेमा और मौखिक इतिहास को बनाएंगी शोध का केंद्र; पीएचडी के बाद मिली महत्वपूर्ण उपलब्धि

मोहम्मदपुर कुन्हारी की बेटी डॉ. शहजादी अंसारी का बड़ा अकादमिक मुकाम, ICSSR पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप के लिए हुआ चयन,,

1947’ की दर्दभरी दास्तान अब IIT रुड़की में होगी रिसर्च का हिस्सा,,

IIT रुड़की में करेंगी शोध—भारत विभाजन की स्मृतियों, साहित्य, सिनेमा और मौखिक इतिहास को बनाएंगी शोध का केंद्र; पीएचडी के बाद मिली महत्वपूर्ण उपलब्धि

हरिद्वार/सुल्तानपुर। मोहम्मदपुर कुन्हारी, सुल्तानपुर की डॉ. शहजादी अंसारी ने शिक्षा और शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उनका चयन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) की पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप 2026–27 के लिए हुआ है। इस फेलोशिप के तहत वह देश के प्रतिष्ठित आईआईटी रुड़की में अपना पोस्ट-डॉक्टोरल शोध कार्य करेंगी। उनकी इस उपलब्धि से क्षेत्र में खुशी का माहौल है और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इसे गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया है।

डॉ. शहजादी अंसारी का शोध कार्य मुख्य रूप से 1947 के भारत विभाजन की स्मृतियों, साहित्य, सिनेमा और मौखिक इतिहास पर केंद्रित है। वह विभाजन के दौरान हुए पलायन, विस्थापन, पुनर्वास और उस दौर की घटनाओं की स्मृतियों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों का अध्ययन कर रही हैं।

विभाजन की स्मृतियों को शोध के जरिए समझने की कोशिश

डॉ. अंसारी लंबे समय से भारत विभाजन से जुड़े विषयों पर अकादमिक अध्ययन कर रही हैं। उनके शोध का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह केवल पुस्तकों और साहित्यिक रचनाओं तक सीमित न रहकर मौखिक इतिहास और विभाजन से प्रभावित लोगों की स्मृतियों को भी अध्ययन का हिस्सा बनाती हैं।

उनका मानना है कि 1947 का विभाजन केवल इतिहास की किताबों में दर्ज एक घटना नहीं है, बल्कि इसके अनुभव और स्मृतियां आज भी कई परिवारों और समुदायों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना में मौजूद हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती इन स्मृतियों को साहित्य, सिनेमा और मौखिक इतिहास के माध्यम से समझना उनके शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उनके प्रस्तावित पोस्ट-डॉक्टोरल शोध में विभाजन से संबंधित साहित्यिक अभिव्यक्तियों, फिल्मों और प्रत्यक्ष अथवा पारिवारिक स्मृतियों का अध्ययन किया जाएगा। इसके माध्यम से वह यह समझने का प्रयास करेंगी कि विभाजन जैसी ऐतिहासिक घटना की स्मृतियां समय के साथ किस प्रकार संरक्षित, परिवर्तित और अगली पीढ़ियों तक पहुंचती हैं।

पीएचडी के बाद हासिल किया नया मुकाम

डॉ. शहजादी अंसारी ने हाल ही में अपनी पीएचडी पूरी की है। पीएचडी के बाद ICSSR की प्रतिष्ठित पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप के लिए उनका चयन उनके अकादमिक सफर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप के लिए चयन के बाद अब उन्हें आईआईटी रुड़की जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपने शोध को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा। यह उनके लिए अपने विषय पर व्यापक और गहन अकादमिक कार्य करने का महत्वपूर्ण मंच होगा।

साहित्य से सिनेमा और मौखिक इतिहास तक फैला शोध

डॉ. अंसारी के शोध की विशेषता इसका बहुआयामी स्वरूप है। विभाजन के अध्ययन में उन्होंने साहित्यिक कृतियों के साथ-साथ सिनेमा और मौखिक इतिहास को भी महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा है।

विभाजन पर लिखे गए साहित्य में विस्थापन, दर्द, पहचान, रिश्तों और पुनर्वास जैसे विषयों की व्यापक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। वहीं फिल्मों में विभाजन की सामाजिक और मानवीय त्रासदी को अलग-अलग दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया गया है। मौखिक इतिहास इन अनुभवों को उन लोगों की आवाज के माध्यम से सामने लाता है, जिन्होंने स्वयं या अपने परिवारों के माध्यम से विभाजन का प्रभाव महसूस किया।

इन्हीं अलग-अलग माध्यमों को एक साथ अध्ययन में शामिल कर डॉ. अंसारी विभाजन की स्मृतियों के व्यापक स्वरूप को समझने का प्रयास कर रही हैं।

क्षेत्र के लिए भी गौरव की बात

मोहम्मदपुर कुन्हारी, सुल्तानपुर से निकलकर उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की फेलोशिप हासिल करना क्षेत्र के लिए भी गौरव की बात है। डॉ. शहजादी अंसारी की उपलब्धि से स्थानीय स्तर पर शिक्षा और शोध के प्रति रुचि रखने वाले युवाओं को भी प्रेरणा मिलने की उम्मीद है।

ICSSR की पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप के माध्यम से उन्हें अपने शोध को आगे बढ़ाने के साथ-साथ देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान में अकादमिक वातावरण में काम करने का अवसर मिलेगा।

डॉ. शहजादी अंसारी का यह सफर यह भी दर्शाता है कि छोटे शहर और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी भी निरंतर अध्ययन, शोध और मेहनत के बल पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं। अब आईआईटी रुड़की में उनके शोध की अगली पारी शुरू होगी, जहां भारत विभाजन की स्मृतियां, साहित्य, सिनेमा और मौखिक इतिहास उनके अकादमिक अध्ययन का केंद्र रहेंगे। उनकी इस उपलब्धि को उनके शैक्षणिक सफर में एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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