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उत्तराखंड में अधिवक्ताओं की सुरक्षा पर बड़ा सवाल! वकीलों पर हमले, हत्या और धमकियों से दहला कानून का गलियारा, अब ‘अधिवक्ता संरक्षण कानून’ के लिए मानवाधिकार आयोग पहुंची हरिद्वार की आवाज….

बागेश्वर के लापता अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह परिहार का शव मिलने के बाद उठा सुरक्षा का तूफान; अरुण भदौरिया सहित छह याचिकाकर्ताओं ने राज्य मानवाधिकार आयोग में लगाई गुहार, वकीलों पर हमला करने वालों के लिए सख्त कानून, तत्काल पुलिस सुरक्षा, विशेष जांच और पीड़ित परिवारों को मुआवजे की मांग....

हरिद्वार। देवभूमि उत्तराखंड में कानून की रक्षा करने वाले ही अगर खुद असुरक्षित हों तो आम आदमी की सुरक्षा का सवाल आखिर कौन उठाएगा? अदालतों में न्याय की लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता आज खुद अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। कभी जानलेवा हमला, कभी हत्या, कभी अपहरण तो कभी धमकियों और झूठी शिकायतों के जरिए मानसिक एवं आर्थिक उत्पीड़न। अधिवक्ताओं के खिलाफ बढ़ती आपराधिक घटनाओं ने अब गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच हरिद्वार से अधिवक्ताओं की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी कानूनी पहल सामने आई है। भदौरिया एडवोकेट एसोसिएट ने उत्तराखंड में सख्त ‘अधिवक्ता संरक्षण विधेयक’ लागू कराने की मांग को लेकर राज्य मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया है।

इस याचिका के पीछे बागेश्वर के अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह परिहार की दर्दनाक घटना को भी प्रमुख आधार बनाया गया है। जानकारी के मुताबिक, धीरेंद्र सिंह परिहार 17 अक्टूबर 2026 से लापता थे। उनके लापता होने के बाद उनकी माता श्रीमती नंदी परिहार ने पुलिस से बेटे की तलाश की गुहार लगाई थी। अधिवक्ताओं, व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों ने प्रदर्शन तथा चक्का जाम कर पुलिस-प्रशासन से जल्द तलाश और मामले का खुलासा करने की मांग की। आखिरकार 3 नवंबर 2026 को उनका शव बागेश्वर के दिगर पाटल क्षेत्र में नदी गांव रोड के पास बरामद हुआ। इस घटना ने अधिवक्ता समुदाय को झकझोर कर रख दिया और वकीलों की सुरक्षा को लेकर चिंता और गहरी हो गई।

अब हरिद्वार से उठी कानून की जंग!

इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए अरुण भदौरिया एडवोकेट, कमल भदौरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदौरिया एडवोकेट पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह, चेतन भदौरिया (एलएलबी अध्ययनरत), शाहनवाज मलिक (एलएलबी अध्ययनरत) और श्रीमती रेखा पांडे एडवोकेट ने राज्य मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड में याचिका दाखिल की है। याचिका में अधिवक्ताओं के खिलाफ हो रही आपराधिक हिंसा को रोकने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अलग से प्रभावी कानून बनाने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अधिवक्ता जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति, आपराधिक तत्व या विवादित पक्ष के खिलाफ न्यायालय में पैरवी करते हैं, कानूनी कार्रवाई में सहयोग करते हैं अथवा अपने मुवक्किल के अधिकारों की रक्षा करते हैं तो कई बार उन्हें धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में झूठी और मनगढ़ंत शिकायतों के माध्यम से अधिवक्ताओं को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिश की जाती है। ऐसी शिकायतों का उद्देश्य उन्हें उनके पेशेवर दायित्वों से रोकना और अनुचित दबाव बनाना होता है।

याचिका में कहा गया है कि न्यायालय परिसर, चैंबर, कार्यालय, आवास और अदालत आते-जाते समय अधिवक्ताओं पर हमले की घटनाएं सामने आती रही हैं। कई मामलों में हत्या, अपहरण और गंभीर शारीरिक चोट पहुंचाने जैसी वारदातें भी हुई हैं। कोटद्वार में एक वरिष्ठ अधिवक्ता की हत्या का मामला भी इस चिंता को गंभीर बनाता है। वहीं, अधिवक्ताओं के कार्यालयों, चैंबरों, वाहनों और अन्य निजी एवं व्यावसायिक संपत्तियों में तोड़फोड़ तथा आगजनी कर आर्थिक नुकसान पहुंचाने की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है।

सिर्फ सुरक्षा नहीं, हमलावरों के खिलाफ विशेष कानून की मांग!

याचिका में सबसे बड़ा सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी उठाया गया है। आरोप है कि कई अवसरों पर शिकायत मिलने के बावजूद अधिवक्ताओं को समय पर सुरक्षा नहीं मिलती और आवश्यक कानूनी कार्रवाई में भी लापरवाही बरती जाती है। इससे अधिवक्ताओं में भय का माहौल बनता है और वे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से अपने मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करने में कठिनाई महसूस करते हैं।

याचिकाकर्ताओं ने उत्तराखंड में प्रस्तावित अधिवक्ता संरक्षण कानून में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल करने की मांग की है।

इनमें अधिवक्ताओं के खिलाफ हिंसा को विशेष अपराध घोषित करना, उनकी निजी एवं व्यावसायिक संपत्तियों की सुरक्षा, तत्काल पुलिस संरक्षण, गंभीर हमलों और हत्या के मामलों की वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की निगरानी में विशेष जांच तथा दुर्भावनापूर्ण झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान प्रमुख हैं।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक जिले में शिकायत निवारण समिति गठित करने की मांग की गई है। इसमें जिला न्यायाधीश अथवा उनके नामित प्रतिनिधि, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिला बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि और अन्य उपयुक्त सदस्यों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है। पीड़ित अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता एवं मुआवजा देने, उनके परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और राज्य स्तर पर 24 घंटे संचालित अधिवक्ता सुरक्षा हेल्पलाइन तथा ऑनलाइन शिकायत पोर्टल स्थापित करने की मांग भी उठाई गई है।

कर्नाटक, राजस्थान और तेलंगाना में कानून, फिर उत्तराखंड क्यों पीछे?

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि कर्नाटक और राजस्थान में वर्ष 2023 में तथा तेलंगाना में वर्ष 2026 में अधिवक्ता संरक्षण से संबंधित कानून बनाए जा चुके हैं। ऐसे में उत्तराखंड में भी प्रदेश की भौगोलिक, सामाजिक और न्यायिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रभावी कानून बनाया जाना जरूरी है।

उत्तराखंड पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों वाला राज्य है। देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर सहित सभी जनपदों में न्यायालयों और तहसीलों में बड़ी संख्या में अधिवक्ता अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा केवल अधिवक्ता समुदाय का विषय नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और आम नागरिकों को न्याय दिलाने से भी जुड़ा हुआ सवाल है।

सरकार को विधानसभा में विधेयक लाने के निर्देश देने की मांग!

भदौरिया एडवोकेट एसोसिएट की ओर से आयोग से मांग की गई है कि राज्य सरकार को व्यापक एवं प्रभावी उत्तराखंड अधिवक्ता संरक्षण विधेयक तैयार कर विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं। विधेयक तैयार करते समय कर्नाटक, राजस्थान और तेलंगाना के कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन कर उत्तराखंड के अनुरूप प्रावधान शामिल किए जाएं।

साथ ही, जब तक अधिवक्ता संरक्षण कानून लागू नहीं होता, तब तक अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए अंतरिम दिशा-निर्देश जारी करने और पुलिस सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग भी की गई है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून के रखवालों की सुरक्षा के लिए उत्तराखंड सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी? क्या अदालतों में न्याय की आवाज बुलंद करने वाले अधिवक्ताओं को भी सुरक्षित माहौल मिल पाएगा? बागेश्वर की दर्दनाक घटना के बाद हरिद्वार से उठी यह कानूनी आवाज अब सरकार और मानवाधिकार आयोग के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है।

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