सोलर स्ट्रीट लाइट का ‘खेल’! कागजों में शून्य, मौके पर 33—जांच ने खोला भ्रष्टाचार के ‘अंधेरे’ का दरवाजा….. शिकायत के बाद अधिकारियों ने मारी अचानक एंट्री तो बदल गई पूरी कहानी, भंगेड़ी में 22 और पीरपुरा में 11 लाइटें मिलीं; उसी फर्म जैसी लाइटें मिलने से बढ़ा शक, लाल पेंट से किया चिन्हीकरण—निदेशालय भेजी गई उच्च स्तरीय जांच की संस्तुति

सोलर स्ट्रीट लाइट का ‘खेल’! कागजों में शून्य, मौके पर 33—जांच ने खोला भ्रष्टाचार के ‘अंधेरे’ का दरवाजा…..
शिकायत के बाद अधिकारियों ने मारी अचानक एंट्री तो बदल गई पूरी कहानी, भंगेड़ी में 22 और पीरपुरा में 11 लाइटें मिलीं; उसी फर्म जैसी लाइटें मिलने से बढ़ा शक, लाल पेंट से किया चिन्हीकरण—निदेशालय भेजी गई उच्च स्तरीय जांच की संस्तुति

हरिद्वार। सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता के दावों के बीच हरिद्वार में सोलर स्ट्रीट लाइटों को लेकर सामने आया मामला अब गंभीर जांच के मोड़ पर पहुंच गया है। शिकायत थी कि कुछ ग्राम पंचायतों में सोलर स्ट्रीट लाइट लगाए बिना ही देहरादून की फर्म विशेष दून टेक, विकासनगर को भुगतान कर दिया गया। साथ ही कुछ पंचायतों में लगाई गई लाइटों को बाद में उखाड़कर ले जाने की शिकायतें भी सामने आईं।शिकायत के बाद जिला पंचायत राज विभाग ने जिले के सभी ब्लॉकों से ग्राम पंचायतवार सोलर स्ट्रीट लाइटों की जानकारी मांगी। यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल सामने आया।
क्या हुआ?—रिकॉर्ड और मौके की तस्वीर अलग निकली
ब्लॉक रुड़की की ग्राम पंचायत भंगेड़ी महावतपुर और ब्लॉक नारसन की ग्राम पंचायत पीरपुरा से पंचायत सचिवों ने सूचना दी कि दोनों पंचायतों में शून्य सोलर स्ट्रीट लाइट लगाई गई हैं।
लेकिन शिकायतों के आधार पर जब औचक जांच कराई गई तो मौके पर तस्वीर बिल्कुल अलग मिली।
भंगेड़ी महावतपुर में 22 और पीरपुरा में 11 सोलर स्ट्रीट लाइटें लगी मिलीं।
यानी रिकॉर्ड में संख्या 0, जबकि मौके पर कुल 33 लाइटें।
यही विरोधाभास अब पूरे मामले की जांच का सबसे अहम आधार बन गया है।
क्यों उठे सवाल?—एक ही फर्म के स्वरूप की लाइटें
जांच में मिली लाइटें उसी फर्म के स्वरूप की बताई गई हैं, जिसके संबंध में बिना लाइट लगाए भुगतान और कुछ स्थानों से लाइटें उखाड़कर ले जाने जैसी शिकायतें प्राप्त हुई थीं।
यहीं से कई सवाल खड़े हो गए हैं—
कागजों में शून्य होने के बावजूद लाइटें मौके तक कैसे पहुंचीं?
इन लाइटों की स्थापना किसके आदेश पर हुई?
क्या इनके संबंध में कोई भुगतान हुआ था?
अगर भुगतान हुआ तो पंचायत रिकॉर्ड में इसका उल्लेख क्यों नहीं है?
क्या कुछ स्थानों से लाइटें हटाई गईं?
और क्या जिले की अन्य पंचायतों में भी ऐसी स्थिति हो सकती है?
इन सवालों का अंतिम जवाब अभी जांच के बाद ही सामने आएगा।
कैसे सामने आया मामला?—शिकायत से शुरू हुई जांच
सोलर स्ट्रीट लाइटों को लेकर मिली शिकायतों के बाद विभाग ने पहले ग्राम पंचायतवार सूचना जुटाई। इसके बाद जिन स्थानों पर रिकॉर्ड और शिकायतों के बीच अंतर की आशंका बनी, वहां औचक जांच कराई गई।
भंगेड़ी महावतपुर और पीरपुरा में मौके पर मिली 33 लाइटों ने मामले को और गंभीर बना दिया।
कौन-कौन जांच के दायरे में?
फिलहाल किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी घोषित नहीं किया गया है। लेकिन उच्च स्तरीय जांच में ग्राम पंचायत रिकॉर्ड, पंचायत स्तर पर उपलब्ध दस्तावेज, फर्म से संबंधित भुगतान, लाइटों की आपूर्ति, स्थापना और उन्हें हटाए जाने की शिकायतों की जांच होना तय माना जा रहा है।
जांच में यह भी स्पष्ट होगा कि रिकॉर्ड में शून्य दर्ज होने के बावजूद मौके पर लाइटें किस प्रक्रिया के तहत लगीं।
कहां मिला मामला?—रुड़की और नारसन ब्लॉक
मामले के दो प्रमुख स्थान सामने आए हैं।
ग्राम पंचायत भंगेड़ी महावतपुर—ब्लॉक रुड़की: 22 लाइटें।
ग्राम पंचायत पीरपुरा—ब्लॉक नारसन: 11 लाइटें।
दोनों स्थानों पर मिली लाइटों का अब विभागीय स्तर पर विशेष चिन्हीकरण कराया गया है।
लाल पेंट से चिन्हीकरण—अब नजर से ओझल नहीं होंगी लाइटें
जांच में पकड़ी गई सोलर स्ट्रीट लाइटों पर डीपीआरओ की ओर से लाल पेंट से चिन्हीकरण कराया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच पूरी होने से पहले इन लाइटों को हटाया या बदला न जा सके और उनकी पहचान बनी रहे।
अब क्या होगा?—निदेशालय करेगा उच्च स्तरीय जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला स्तर से प्रारंभिक जांच आख्या और उच्च स्तरीय जांच की संस्तुति निदेशालय को भेज दी गई है।
अब जांच का दायरा केवल भंगेड़ी और पीरपुरा तक सीमित रहेगा या जिले की अन्य ग्राम पंचायतों तक भी पहुंचेगा, यह आगे तय होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—कागजों में ‘शून्य’ और जमीन पर ‘33’ का यह अंतर आखिर पैदा कैसे हुआ?
क्या यह महज रिकॉर्ड की गलती है, प्रक्रिया में चूक है या फिर इसके पीछे कोई सुनियोजित गड़बड़ी?
इन सवालों पर अब उच्च स्तरीय जांच की नजर है। जांच पूरी होने तक किसी व्यक्ति या फर्म को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन कागज और जमीन के बीच सामने आया यह अंतर सरकारी व्यवस्था के लिए निश्चित तौर पर बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है।



