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राज्यसभा में डॉ. नरेश बंसल ने किया सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश संख्या संशोधन विधेयक-2026 का समर्थन,, कहा— न्याय में देरी केवल मुकदमों को नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को भी लंबित करती है,, सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 (मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 38) करने को बताया न्याय व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

 राज्यसभा में डॉ. नरेश बंसल ने किया सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश संख्या संशोधन विधेयक-2026 का समर्थन,,

कहा— न्याय में देरी केवल मुकदमों को नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को भी लंबित करती है,,

सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 (मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 38) करने को बताया न्याय व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय सहकोषाध्यक्ष डॉ. नरेश बंसल ने बुधवार को राज्यसभा में सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों की संख्या संशोधन विधेयक-2026 पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह केवल चार नए न्यायाधीशों के पद बढ़ाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था की संस्थागत क्षमता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम है।

डॉ. बंसल ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार सदन के प्रति जवाबदेह होती है। जब संसद का सत्र नहीं होता और तत्काल आवश्यकता होती है, तब सरकार अध्यादेश के माध्यम से कानून लाती है तथा बाद में संसद के समक्ष विधेयक रखकर चर्चा के बाद उसे पारित कराया जाता है। उन्होंने बताया कि यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों की संख्या संशोधन अध्यादेश-2026 का स्थान लेगा।उन्होंने कहा कि वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 है, जिसे बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव है। भारत के मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर कुल संख्या 38 हो जाएगी। इसके साथ ही चार नए न्यायिक पदों के लिए आवश्यक प्रशासनिक ढांचा और वित्तीय प्रावधान भी किए जाएंगे।

डॉ. बंसल ने न्यायिक लंबित मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में 95 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। वर्ष 2025 में 75,410 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 65,615 मामलों का ही निस्तारण हो सका। ऐसे में लगभग 10 हजार अतिरिक्त मामले लंबित रह गए। उन्होंने कहा कि जब नए मामलों की संख्या निस्तारण से अधिक हो, तो न्याय व्यवस्था की क्षमता बढ़ाना समय की आवश्यकता बन जाती है।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-21 प्रत्येक नागरिक को त्वरित न्याय का संवैधानिक अधिकार देता है। न्याय में देरी केवल मुकदमों को लंबित नहीं रखती, बल्कि नागरिकों का न्यायपालिका पर विश्वास भी प्रभावित करती है।

अपने संबोधन में डॉ. बंसल ने कहा कि देश में 3,525 जनहित याचिकाएं (PIL) लंबित हैं, जिनमें 698 एक दशक से अधिक पुरानी हैं। सबसे पुरानी जनहित याचिका वर्ष 1984 की है। उन्होंने कहा कि यदि चार दशक बाद भी न्याय की प्रतीक्षा करनी पड़े तो न्याय व्यवस्था की क्षमता पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि इस विधेयक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य संविधान पीठों का नियमित गठन सुनिश्चित करना भी है, ताकि संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई नियमित न्यायिक कार्यों को प्रभावित किए बिना समयबद्ध ढंग से हो सके। उन्होंने टेली-लॉ सेवा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सुविधा 776 जिलों और ढाई लाख ग्राम पंचायतों तक पहुंच चुकी है तथा इसके माध्यम से 1.12 करोड़ से अधिक लोगों को मुकदमे पूर्व कानूनी परामर्श उपलब्ध कराया गया है।

अपने संबोधन के अंत में डॉ. नरेश बंसल ने कहा, “धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात जो न्याय और धर्म की रक्षा करता है, न्याय उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका जितनी मजबूत होगी, संविधान उतना ही मजबूत होगा और संविधान जितना सशक्त होगा, देश का प्रत्येक नागरिक उतना ही सुरक्षित होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि यह विधेयक देश में समयबद्ध और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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