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सरकारी सड़क का पैसा निजी जमीन पर खर्च! जांच में खुला 1.96 लाख का खेल, प्रधान और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी पर गिरी वसूली की गाज,… हबीबपुर कुड़ी में मेन रोड से जेएस हॉस्पिटल मेडिकल की ओर सीसी सड़क निर्माण पर उठे सवाल—संयुक्त जांच में 1.96 लाख रुपये का काम निजी भूमि पर मिला, दोनों से 98-98 हजार की वसूली के आदेश; आखिर सरकारी निधि का पैसा निजी जमीन तक कैसे पहुंचा?

सरकारी सड़क का पैसा निजी जमीन पर खर्च! जांच में खुला 1.96 लाख का खेल, प्रधान और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी पर गिरी वसूली की गाज,…

हबीबपुर कुड़ी में मेन रोड से जेएस हॉस्पिटल मेडिकल की ओर सीसी सड़क निर्माण पर उठे सवाल—संयुक्त जांच में 1.96 लाख रुपये का काम निजी भूमि पर मिला, दोनों से 98-98 हजार की वसूली के आदेश; आखिर सरकारी निधि का पैसा निजी जमीन तक कैसे पहुंचा?

लक्सर/हरिद्वार। सरकारी धन से विकास कार्य कराने का दावा हो और जांच में उसी धन से निजी भूमि पर निर्माण सामने आ जाए, तो सवाल सिर्फ सड़क का नहीं रहता—सवाल उठता है कि आखिर सरकारी खजाने की रकम खर्च करने से पहले नियम-कायदे कहां थे? हबीबपुर कुड़ी ग्राम पंचायत में सामने आए इसी मामले ने पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की निगरानी और जिम्मेदारी को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामले में जिला पंचायतराज विभाग की कार्रवाई के बाद 1.96 लाख रुपये की पूरी धनराशि ग्राम निधि खाते में वापस जमा कराई गई है।

मामला ग्राम पंचायत हबीबपुर कुड़ी, विकासखंड लक्सर का है। गांव निवासी विकास कुमार पुत्र मदनपाल ने 29 मई 2025 को शिकायत कर ग्राम पंचायत द्वारा कराए गए सीसी निर्माण को लेकर सवाल उठाए थे। शिकायत के बाद मामला जांच के लिए पहुंचा और परियोजना निदेशक, जिला ग्राम्य विकास अभिकरण हरिद्वार, खंड विकास अधिकारी लक्सर तथा अपर सहायक अभियंता सिंचाई विभाग हरिद्वार की संयुक्त टीम ने 22 जनवरी 2026 को स्थलीय जांच की।

जांच में निकला ऐसा सच, जिसने पूरे निर्माण पर खड़े कर दिए सवाल

संयुक्त जांच आख्या में सामने आया कि ग्राम पंचायत हबीबपुर कुड़ी की ओर से मेन रोड से जेएस हॉस्पिटल मेडिकल की ओर सीसी निर्माण कराया गया था। जांच में इस निर्माण का कुछ हिस्सा अस्पताल की निजी भूमि पर पाया गया। निजी भूमि पर हुए इस निर्माण की लागत करीब 1.96 लाख रुपये बताई गई।

यहीं से मामला सामान्य निर्माण कार्य से निकलकर सरकारी धन के इस्तेमाल और जिम्मेदारी तय करने तक पहुंच गया।

जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित अधिकारियों ने जिम्मेदार लोगों से जवाब मांगा। जिलाधिकारी हरिद्वार के कार्यालय से 13 मई 2026 को जारी पत्र तथा जिला पंचायतराज अधिकारी हरिद्वार के 12 मई 2026 के पत्र के क्रम में ग्राम पंचायत विकास अधिकारी नीरज कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। वहीं ग्राम प्रधान सुधा देवी भी इस मामले में कार्रवाई के दायरे में आईं।

नोटिस आया तो जवाब भी आया, लेकिन जांच के बाद वसूली तय

कारण बताओ नोटिस का जवाब ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी की ओर से 25 मई 2026 को कार्यालय में उपलब्ध कराया गया। विभाग ने उनके जवाब के साथ पत्रावली में सुरक्षित अभिलेखों और संयुक्त जांच रिपोर्ट का परीक्षण किया।

परीक्षण के बाद विभाग ने माना कि 1.96 लाख रुपये का कार्य निजी भूमि पर पाया गया। इसके बाद जिला पंचायतराज अधिकारी कार्यालय की ओर से 10 जुलाई 2026 को अलग-अलग पत्र जारी किए गए।

इस कार्रवाई में निर्माण की पूरी धनराशि की जिम्मेदारी आधे-आधे हिस्से में निर्धारित की गई। यानी ग्राम प्रधान सुधा देवी से 98 हजार रुपये और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी नीरज कुमार से भी 98 हजार रुपये की वसूली निर्धारित की गई।

विभागीय आदेश में इस वसूली को उत्तराखंड पंचायतीराज अधिनियम, 2016 की धारा 193 के तहत ग्राम निधि खाते में जमा कराने के निर्देश दिए गए।

सरकारी पैसा वापस आया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम!

मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब जिला पंचायतराज अधिकारी के आदेश के अनुपालन में ग्राम प्रधान सुधा देवी और ग्राम पंचायत विकास अधिकारी नीरज कुमार ने 27 अगस्त 2026 के पत्र के माध्यम से 1.96 लाख रुपये ग्राम पंचायत निधि के खाते में जमा करा दिए।

यानी जिस रकम को लेकर सवाल खड़े हुए थे, वह रकम अब ग्राम निधि में वापस पहुंच चुकी है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा प्रशासनिक सवाल भी सामने खड़ा है—जब पैसा ग्राम पंचायत निधि का था तो निर्माण निजी भूमि पर कराने की स्थिति बनी कैसे?

क्या निर्माण से पहले भूमि का सत्यापन नहीं हुआ?
क्या प्रस्ताव और अभिलेखों में भूमि की स्थिति स्पष्ट नहीं थी?
क्या मौके पर काम शुरू होने से पहले संबंधित स्तर पर जांच की गई थी?
और यदि जांच हुई थी तो निजी भूमि पर सरकारी धन से निर्माण आखिर किस आधार पर कराया गया?

इन सवालों का जवाब विभागीय कार्रवाई में वसूली से आगे भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मामला सिर्फ 1.96 लाख रुपये का नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर विकास कार्यों की प्रक्रिया और निगरानी का भी है।

जांच ने दिखाई तस्वीर, कार्रवाई ने तय की जिम्मेदारी

विभागीय प्रेस नोट के अनुसार, कार्रवाई किसी मौखिक आरोप के आधार पर नहीं बल्कि संयुक्त जांच आख्या, उपलब्ध अभिलेखों और संबंधित पक्षों के जवाब के परीक्षण के बाद की गई। इसी प्रक्रिया के बाद 98-98 हजार रुपये की वसूली निर्धारित की गई और अंततः पूरी 1.96 लाख रुपये की राशि ग्राम निधि खाते में जमा कराई गई।

यह कार्रवाई पंचायतों में विकास कार्यों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है कि सरकारी निधि से होने वाले निर्माण में भूमि, अभिलेख और कार्यस्थल की स्थिति को लेकर लापरवाही की कीमत जिम्मेदार लोगों को चुकानी पड़ सकती है।

फिलहाल विभागीय रिकॉर्ड के मुताबिक 1.96 लाख रुपये की धनराशि ग्राम पंचायत निधि में वापस जमा हो चुकी है। हालांकि उपलब्ध प्रेस नोट में किसी आपराधिक मुकदमे या भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस मामले को विभागीय जांच और धनराशि की वसूली से जुड़ी कार्रवाई के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अब असली सवाल यही है—सरकारी सड़क की रकम निजी जमीन तक पहुंची कैसे? जांच ने रकम वापस तो करा दी, लेकिन पंचायत व्यवस्था की निगरानी पर उठे सवालों का जवाब आने वाले समय में ही साफ होगा।

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