उर्स की आड़ में ‘वसूली का बाजार’ या वैध अस्थाई दुकानें? पिरान कलियर में करीब 30 दुकानों ने खड़े किए बड़े सवाल!,, एक कथित गेस्ट हाउस संचालक का नाम भी सरग़ना की चर्चा में,, दरगाह प्रशासन बोला—दुकानें हमारी नहीं! फिर सड़क किनारे किसके आदेश से सज गया पूरा बाजार? 1300 रुपये प्रति वर्गफीट तक कथित वसूली की चर्चा, लाखों के लेनदेन पर उठे सवाल,,
अब ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से सीधा आग्रह,, दरगाह प्रशासन ने पल्ला झाड़ा तो अब जिम्मेदारी किसकी?,, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से तत्काल संज्ञान लेकर मौके पर जांच का आग्रह—टेंडर, अनुमति, रसीद और भुगतान का हिसाब सार्वजनिक हो; वैधता है तो भ्रम दूर हो, अनियमितता है तो कार्रवाई हो,, 1300 रुपये प्रति वर्गफीट की चर्चा—कहां से आया यह आंकड़ा?

उर्स की आड़ में ‘वसूली का बाजार’ या वैध अस्थाई दुकानें? पिरान कलियर में करीब 30 दुकानों ने खड़े किए बड़े सवाल!,,
एक कथित गेस्ट हाउस संचालक का नाम भी सरग़ना की चर्चा में,,
दरगाह प्रशासन बोला—दुकानें हमारी नहीं! फिर सड़क किनारे किसके आदेश से सज गया पूरा बाजार? 1300 रुपये प्रति वर्गफीट तक कथित वसूली की चर्चा, लाखों के लेनदेन पर उठे सवाल,,
अब ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से सीधा आग्रह,,
दरगाह प्रशासन ने पल्ला झाड़ा तो अब जिम्मेदारी किसकी?,,
ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से तत्काल संज्ञान लेकर मौके पर जांच का आग्रह—टेंडर, अनुमति, रसीद और भुगतान का हिसाब सार्वजनिक हो; वैधता है तो भ्रम दूर हो, अनियमितता है तो कार्रवाई हो,,
1300 रुपये प्रति वर्गफीट की चर्चा—कहां से आया यह आंकड़ा?

पिरान कलियर। पिरान कलियर का सालाना उर्स जहां देशभर से आने वाले जायरीनों की आस्था का बड़ा केंद्र है, वहीं उर्स के दौरान सड़क किनारे लगाई गई करीब 30 अस्थाई दुकानों को लेकर अब एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब प्रशासन को देना ही होगा।
आखिर इन दुकानों को लगाया किसने?
झंडा होटल के सामने से लेकर फव्वारा चौक तक सड़क के दोनों ओर अस्थाई दुकानें सजी हैं। स्थानीय स्तर पर दुकानदारों से कथित तौर पर मोटी रकम लिए जाने की चर्चा है। यहां तक कि 1300 रुपये प्रति वर्गफीट तक की कथित दर की बात भी सामने आ रही है।
रकम कितनी है, किसने ली और किस आधार पर ली गई—यह अभी जांच का विषय है।
लेकिन सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि दरगाह प्रशासन इन दुकानों को अपनी ओर से लगाए जाने से इनकार कर रहा है।
तो फिर—
सड़क किसकी अनुमति से इस्तेमाल हुई?
दुकानें किसने लगवाईं?
दुकानदारों से पैसा लेने का अधिकार किसके पास था?
और प्रशासन को इसकी जानकारी थी या नहीं?
दरगाह प्रशासन ने पल्ला झाड़ा तो अब जिम्मेदारी किसकी?
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यही है।
यदि दरगाह प्रशासन ने दुकानें नहीं लगाईं तो प्रशासनिक रिकॉर्ड में यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन दुकानों के लिए किस विभाग अथवा प्राधिकारी ने अनुमति जारी की।
यदि अनुमति नहीं दी गई तो सार्वजनिक सड़क पर इतना बड़ा अस्थाई बाजार कैसे खड़ा हो गया?
और यदि किसी व्यक्ति को दुकानें लगाने तथा शुल्क वसूलने का अधिकार दिया गया था तो उस अधिकार का दस्तावेज कहां है?
अब मौखिक जवाब नहीं, दस्तावेज चाहिए।
1300 रुपये प्रति वर्गफीट की चर्चा—कहां से आया यह आंकड़ा?
स्थानीय स्तर पर दुकानदारों से कथित तौर पर 1300 रुपये प्रति वर्गफीट तक की रकम लिए जाने की चर्चा ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।
यह रकम वास्तव में ली गई या नहीं, इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
लेकिन प्रशासन चाहे तो इसकी सच्चाई कुछ ही घंटों में सामने आ सकती है।
हर दुकान पर जाकर पूछा जाए—
कितने रुपये दिए?
किसे दिए?
कब दिए?
कैसे दिए?
रसीद मिली या नहीं?
रसीद किसके नाम की है?
ऑनलाइन भुगतान हुआ तो किस खाते में गया?
यही सवाल कथित वसूली की पूरी कहानी खोल सकते हैं।
एक कथित गेस्ट हाउस संचालक का नाम भी चर्चा में
स्थानीय स्तर पर इस कथित व्यवस्था के पीछे एक गेस्ट हाउस संचालक का नाम चर्चा में बताया जा रहा है।
आरोप है कि उसके स्तर से सड़क के दोनों ओर दुकानें लगवाई गईं और दुकानदारों से कथित तौर पर रकम ली गई।
यह आरोप अभी प्रमाणित नहीं है।
इसलिए संबंधित व्यक्ति का पक्ष लिया जाना और उसके पास मौजूद दस्तावेजों की जांच किया जाना बेहद जरूरी है।
यदि उसके पास वैध अनुमति है तो मामला स्पष्ट हो जाएगा।
यदि नहीं है तो फिर सवाल उठेगा कि आखिर किसके संरक्षण, आदेश या मौन सहमति से यह व्यवस्था चलती रही?
अब ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से सीधा आग्रह
मामले की गंभीरता को देखते हुए ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से विनम्र आग्रह है कि इस प्रकरण का तत्काल संज्ञान लिया जाए।
प्रशासनिक टीम को मौके पर भेजकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
जांच में विशेष रूप से यह देखा जाए कि—
▶ कितनी अस्थाई दुकानें लगी हैं?
▶ दुकानें किस भूमि/सड़क क्षेत्र में लगी हैं?
▶ अनुमति किस विभाग ने दी?
▶ क्या कोई टेंडर या ठेका हुआ?
▶ ठेका किस व्यक्ति/संस्था के नाम है?
▶ दुकानदारों से निर्धारित शुल्क कितना लिया जाना था?
▶ वास्तव में कितना पैसा लिया गया?
▶ किसके द्वारा पैसा लिया गया?
▶ क्या दुकानदारों को रसीद दी गई?
▶ पैसा सरकारी/अधिकृत खाते में जमा हुआ या नहीं?
▶ सड़क और सार्वजनिक स्थान के इस्तेमाल की अनुमति किस आधार पर मिली?
इन सवालों का जवाब सामने आते ही पूरा मामला साफ हो सकता है।
अगर सब वैध है तो प्रशासन खुद करे खुलासा
यह खबर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को सामने रखने के लिए है।
यदि अस्थाई दुकानें नियमों के अनुसार लगाई गई हैं, वैध अनुमति है और निर्धारित शुल्क लिया गया है तो प्रशासन को इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
इससे दुकानदारों के बीच चल रही चर्चाओं पर भी विराम लगेगा और किसी निर्दोष व्यक्ति पर लग रहे आरोप भी समाप्त होंगे।
लेकिन यदि अनुमति नहीं है और सार्वजनिक स्थान का इस्तेमाल कर निजी स्तर पर कथित रकम वसूली जा रही है तो कार्रवाई जरूरी है।
प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ा सवाल ? पारदर्शिता और जीरो टॉलरेंस परीक्षा की कसौटी
दरगाह प्रशासन कह रहा है—दुकानें हमारी नहीं।
सड़क पर दुकानें मौजूद हैं।
दुकानदारों से रकम लिए जाने की चर्चा है।
1300 रुपये प्रति वर्गफीट तक की कथित दर सामने आ रही है।
और अभी तक कोई स्पष्ट प्रशासनिक कार्रवाई सार्वजनिक नहीं हुई।
तो फिर सवाल यही है—
‘यह बाजार किसके आदेश पर लगा?’
और—
‘कथित रकम किसकी जेब में जा रही है?’
उर्स की आस्था के बीच पारदर्शिता सबसे जरूरी
पिरान कलियर का उर्स लाखों जायरीनों की आस्था से जुड़ा आयोजन है। ऐसे आयोजन में किसी भी प्रकार की अनधिकृत वसूली की शिकायत व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
इसलिए हमारा प्रशासन से आग्रह है कि मामले को राजनीतिक, व्यक्तिगत या आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाने के बजाय रिकॉर्ड और जांच के आधार पर स्पष्ट किया जाए।
दुकानदारों के बयान लिए जाएं।
टेंडर रिकॉर्ड जांचे जाएं।
अनुमति पत्र देखे जाएं।
रसीदों की जांच हो।
भुगतान का हिसाब लिया जाए।
और यदि किसी व्यक्ति ने बिना अधिकार रकम वसूली है तो उसकी भूमिका तय की जाए।
अब चुप्पी नहीं, जांच चाहिए!
ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ से पुनः विनम्र निवेदन है कि इस मामले का तत्काल संज्ञान लेकर मौके पर जांच कराई जाए और जांच के निष्कर्षों को सार्वजनिक किया जाए।
वैध है तो वैध साबित हो।
अवैध है तो कार्रवाई हो।
रकम अधिकृत है तो उसका हिसाब सामने आए।
और यदि कथित वसूली हुई है तो जिम्मेदार कौन है—यह भी जनता के सामने आए।
क्योंकि पिरान कलियर के उर्स में आने वाला जायरीन आस्था लेकर आता है, किसी कथित वसूली के खेल का हिस्सा बनने नहीं।
अब सवाल 30 दुकानों का नहीं—सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता, सार्वजनिक स्थान के इस्तेमाल और कथित लाखों रुपये की वसूली की सच्चाई का है।
जांच का इंतजार है। अब निगाहें ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दीपक रामचंद्र शेठ और स्थानीय प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।



