दरगाह पिरान कलियर की संपत्तियों पर ‘अवैध कब्जा सिंडिकेट’ का खेल? रसूखदार (02 सुपरवाइजरो) की तानाशाही से सिस्टम बेबस!,, “बाहरी व्यक्ति पर दरगाह भवन कब्जाने का आरोप, सुपरवाइजरों की सांठगांठ और प्रशासनिक चुप्पी पर उठे बड़े सवाल,, “सीएम धामी के ‘ऑपरेशन कालनेमी’ को भी चुनौती? आस्था की संपत्तियों पर अवैध कब्जे, संरक्षण और दरगाह के सुपरवाइजरी सिस्टम के तुगलकी फरमानों/संरक्षण से मचा बवाल”

इन्तजार रजा हरिद्वार- दरगाह पिरान कलियर की संपत्तियों पर ‘अवैध कब्जा सिंडिकेट’ का खेल? रसूखदार (02 सुपरवाइजरो) की तानाशाही से सिस्टम बेबस!,,
“बाहरी व्यक्ति पर दरगाह भवन कब्जाने का आरोप, सुपरवाइजरों की सांठगांठ और प्रशासनिक चुप्पी पर उठे बड़े सवाल,,
“सीएम धामी के ‘ऑपरेशन कालनेमी’ को भी चुनौती? आस्था की संपत्तियों पर अवैध कब्जे, संरक्षण और दरगाह के सुपरवाइजरी सिस्टम के तुगलकी फरमानों/संरक्षण से मचा बवाल”

पिरान कलियर दरगाह एक बार फिर विवादों के भंवर में घिरती नजर आ रही है। इस बार मामला सिर्फ अवैध कब्जे तक सीमित नहीं है, बल्कि दरगाह की संपत्तियों, संसाधनों और प्रशासनिक व्यवस्था पर कथित रूप से कब्जा जमाए बैठे रसूखदारों के नेटवर्क तक जा पहुंचा है। आरोप इतने गंभीर हैं कि अब स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि आखिर दरगाह का संचालन नियमों से हो रहा है या कुछ प्रभावशाली लोगों की “तानाशाही” से।
दादूपुर गोविंदपुर निवासी वाजिद अली द्वारा तहसीलदार रुड़की और दरगाह प्रबंधक को दिए गए प्रार्थना पत्र ने पूरे मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मुरादाबाद निवासी मौ० रफी नामक व्यक्ति ने दरगाह के दक्षिणी गेट परिसर स्थित एक भवन पर लंबे समय से कब्जा जमा रखा है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस व्यक्ति को दरगाह कार्यालय में कार्यरत कथित रसूखदार सुपरवाइजरों का संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते आज तक उसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
दरगाह में पिछले कुछ वर्षों से दो कथित प्रभावशाली सुपरवाइजरों की “मनमानी व्यवस्था” चल रही है। आरोप है कि दरगाह के संसाधनों का खुलकर दुरुपयोग हो रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठे हैं। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि दरगाह परिसर में कौन रहेगा, किसे संरक्षण मिलेगा और किसे बाहर किया जाएगा— यह सब कुछ कथित तौर पर कुछ चुनिंदा लोगों के इशारों पर तय हो रहा है।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि शिकायतकर्ता ने पुराने दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया है कि यह पूरा मामला नया नहीं है। वर्ष 2017 में भी इस प्रकरण को लेकर शिकायत हुई थी, जिसके बाद तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट रुड़की ने नायब तहसीलदार श्री चित्र कुमार त्यागी को जांच सौंपी थी। जांच के दौरान कथित रूप से यह पाया गया था कि मौ० रफी को दरगाह कार्यालय में रखने की कोशिश “आपत्तिजनक और साजिशपूर्ण” थी। इसके बाद तत्कालीन अधिकारियों द्वारा संबंधित सुपरवाइजर और दरगाह प्रबंधन से जवाब भी मांगा गया था।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब 2017 में मामला प्रशासनिक रिकॉर्ड तक पहुंच गया था, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर किसके दबाव में पूरा मामला वर्षों तक दबा रहा? और यदि जांच में आपत्तियां दर्ज हुई थीं, तो फिर कथित कब्जाधारी आज तक दरगाह परिसर में कैसे बना हुआ है? आरोप है कि दरगाह की संपत्तियां धीरे-धीरे कुछ लोगों के निजी प्रभाव क्षेत्र में बदलती जा रही हैं। यही वजह है कि अब “दरगाह बचाओ” जैसी चर्चाएं भी स्थानीय स्तर पर शुरू हो गई हैं। लोगों का कहना है कि दरगाह आस्था का केंद्र है, लेकिन यहां संसाधनों की खुली लूट और कब्जे के आरोप बेहद चिंताजनक हैं।
इस पूरे विवाद को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के “ऑपरेशन कालनेमी” अभियान से जोड़कर भी देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि जहां एक ओर मुख्यमंत्री अवैध गतिविधियों, भूमाफियाओं और भ्रष्ट नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दरगाह से जुड़े ऐसे मामलों में कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ रसूखदार तत्वों ने सिस्टम को इस कदर प्रभावित कर रखा है कि प्रशासनिक कार्रवाई भी कागजों से आगे नहीं बढ़ पाती।
इतना ही नहीं, दरगाह प्रशासन पर “तुगलकी फरमानों” के आरोप भी लगने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नियमों और पारदर्शिता के बजाय अब व्यक्तिगत प्रभाव और दबाव के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं। यही कारण है कि दरगाह की व्यवस्था को लेकर आम लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
शिकायतकर्ता वाजिद अली ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, कब्जे वाले भवन को तत्काल खाली कराया जाए और जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाए उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। उन्होंने पूर्व दरगाह प्रबंधक मौ० हारून और श्रीमती रजिया द्वारा दी गई रिपोर्टों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन दस्तावेजों की जांच की जाए तो कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।
अब यह मामला केवल एक कब्जे का नहीं रह गया है, बल्कि दरगाह प्रशासन की पारदर्शिता, जवाबदेही और सरकारी तंत्र की निष्क्रियता पर बड़ा सवाल बन चुका है। लोगों की निगाहें अब तहसील प्रशासन, दरगाह प्रबंधन और शासन पर टिकी हैं। सवाल साफ है— क्या दरगाह की संपत्तियों पर कथित कब्जों और संरक्षण देने वालों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



