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(अजब-गजब भ्रष्टाचार / “कलियर दरगाह में मौखिक आदेशों” की सरकार?,, दरगाह पिरान कलियर में आखिर किसका चलता है सिस्टम!),, “कुछ तथाकथितो द्वारा भ्रामक प्रचार” बताकर कालनेमी पर सवाल दबाने की कोशिश? दरगाह में फर्जी नियुक्ति, अवैध कब्जों और संरक्षण पर फिर उठे गंभीर सवाल!,, “मौ. रफी प्रकरण पर घिरा दरगाह प्रशासन — लिखित आदेश गायब, ‘मौखिक निर्देश’ की कहानी से बढ़ा विवाद,, सुपरवाइजर पर कार्रवाई क्यों नहीं,, “जो सवाल पूछे वही ‘बाहरी’ ’? जनता बोली — आखिर पारदर्शिता के सवाल से डर क्यों!”

आखिर किसे बचा रहा दरगाह सिस्टम!”,, सुपरवाइजरी सिस्टम पर कार्रवाई क्यों नहीं

इन्तजार रजा हरिद्वार – (अजब-गजब भ्रष्टाचार / “कलियर दरगाह में मौखिक आदेशों” की सरकार?,, दरगाह पिरान कलियर में आखिर किसका चलता है सिस्टम!),,

“कुछ तथाकथितो द्वारा भ्रामक प्रचार” बताकर कालनेमी पर सवाल दबाने की कोशिश? दरगाह में फर्जी नियुक्ति, अवैध कब्जों और संरक्षण पर फिर उठे गंभीर सवाल!,,

“मौ. रफी प्रकरण पर घिरा दरगाह प्रशासन — लिखित आदेश गायब, ‘मौखिक निर्देश’ की कहानी से बढ़ा विवाद,, सुपरवाइजर पर कार्रवाई क्यों नहीं,,

“जो सवाल पूछे वही ‘बाहरी’ ’? जनता बोली — आखिर पारदर्शिता के सवाल से डर क्यों!”

दरगाह पिरान कलियर की व्यवस्थाओं को लेकर जारी विवाद अब और गहराता दिखाई दे रहा है। जहां एक ओर कुछ लोग प्रशासनिक कार्यप्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और नियमसम्मत बताकर सवाल उठाने वालों को “बाहरी व्यक्ति” और “भ्रामक प्रचारक” कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों, दरगाह से जुड़े जिम्मेदार नागरिकों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए सवाल उठाने वालों को बदनाम किया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल मौ. रफी की नियुक्ति और सुपरवाइजरी बहाली को लेकर खड़ा हो रहा है। दरगाह प्रशासन से जुड़े लोगों द्वारा यह कहा जा रहा है कि यदि उनसे कार्य लिया जा रहा है तो वह “प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र” का विषय है और संभवतः “मौखिक निर्देशों” के आधार पर कार्यवाही हुई है। लेकिन अब यही “मौखिक आदेश” पूरे विवाद की जड़ बन गया है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर सरकारी और संवेदनशील संस्थानों में बिना लिखित आदेश के किस नियम के तहत नियुक्तियां और जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि सब कुछ वैधानिक और पारदर्शी है तो फिर लिखित आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे? आखिर किस अधिकारी ने मौ. रफी को कार्य करने की अनुमति दी? यदि प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन हुआ है तो उसका रिकॉर्ड जनता और मीडिया से छिपाया क्यों जा रहा है? यही वजह है कि अब पूरा मामला “मौखिक सरकार” बनाम “लिखित प्रशासन” की बहस में बदलता जा रहा है।

दरगाह क्षेत्र में लंबे समय से अवैध कब्जों, फर्जी व्यवस्थाओं और कथित संरक्षण के आरोप लगते रहे हैं। कई स्थानीय लोगों का आरोप है कि दरगाह की संपत्तियों पर कब्जा करने वाले रसूखदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, जबकि छोटे लोगों पर तुरंत नियम लागू कर दिए जाते अतिक्रमणक नाम पर बुलडोजर चला दिए जाते हैं । सवाल उठ रहा है कि आखिर इतने वर्षों से अवैध कब्जों पर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई, दरगाह परिसर में अवैध कब्जो मे जमे रसूखदार कालनेमीयों को क्यों छुपाया जा रहा है क्या इसके पीछे भी वही “ऊपर से मौखिक आदेश” वाला खेल काम कर रहा है?

कुछ लोगों का कहना है कि जब भी कोई व्यक्ति दरगाह की व्यवस्थाओं, संपत्तियों या प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाता है, उसे तुरंत “व्यवस्था विरोधी”, “बाहरी” या “दुष्प्रचारक” घोषित कर दिया जाता है। आलोचकों का आरोप है कि यह तरीका असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने और जवाबदेही से बचने का माध्यम बन चुका है।

स्थानीय चर्चाओं में यह बात भी तेजी से उठ रही है कि यदि पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता सवाल नहीं पूछेंगे तो फिर पारदर्शिता कैसे आएगी? क्या लोकतंत्र में प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाना अपराध हो गया है? लोग पूछ रहे हैं कि यदि दरगाह प्रशासन पूरी तरह साफ-सुथरा है तो फिर मीडिया रिपोर्टों और वायरल वीडियो से इतनी बेचैनी क्यों दिखाई दे रही है?

दरगाह से जुड़े कुछ जिम्मेदार नागरिकों का कहना है कि “भ्रामक प्रचार” शब्द का इस्तेमाल करके हर सवाल को दबाने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि असली मुद्दा यह नहीं कि सवाल कौन पूछ रहा है, बल्कि यह है कि सवालों का जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा। यदि मौ. रफी की नियुक्ति वैध है तो आदेश सार्वजनिक किया जाए। यदि अवैध कब्जों पर कार्रवाई हुई है तो उसकी सूची जारी की जाए। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो जांच से डर कैसा?

इधर सोशल मीडिया पर वायरल चर्चाओं ने भी प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या दरगाह का सिस्टम अब फाइलों से नहीं बल्कि “फोन कॉल” और “मौखिक आदेशों” से चलेगा? क्या सुपरवाइजरी सिस्टम कुछ खास लोगों को बचाने का माध्यम बन चुका है? और सबसे बड़ा सवाल — आखिर वो “साहब” कौन हैं, जिनके नाम पर पूरे सिस्टम को चलाने की बातें कही जा रही हैं?

आम जनमानस में यह भावना भी दिखाई दे रही है कि दरगाह जैसी संवेदनशील और आस्था से जुड़ी संस्था में पारदर्शिता सबसे अधिक जरूरी है। यहां हर निर्णय लिखित, सार्वजनिक और नियमों के अनुरूप होना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार का विवाद पैदा न हो। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

अब लोगों की निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों पर टिकी हैं। जनता जानना चाहती है कि क्या फर्जी नियुक्तियों, अवैध कब्जों और कथित संरक्षण के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या “मौखिक आदेश” देने वाले अधिकारियों की पहचान सामने आएगी? या फिर हर बार की तरह यह मामला भी ब्यानबाजी और सफाइयों के बीच दबा दिया जाएगा?

दरगाह पिरान कलियर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में यहां की व्यवस्थाओं पर उठ रहे सवालों को “भ्रामक प्रचार” कहकर खारिज करने के बजाय पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ जवाब देना ही प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जा रही है।

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