166 दिन जेल में निर्दोष सिपाही, गलत पहचान ने छीन ली आजादी,, 1998 में मर चुके व्यक्ति के वारंट पर लखनऊ के सिपाही की गिरफ्तारी, राजस्थान पुलिस की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल,, 15 फरवरी को गिरफ्तार हुए अखिलेश त्रिपाठी एक अगस्त को जेल से बाहर आए, हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब आखिरकार मिली ड्यूटी जॉइनिंग

166 दिन जेल में निर्दोष सिपाही, गलत पहचान ने छीन ली आजादी,,
1998 में मर चुके व्यक्ति के वारंट पर लखनऊ के सिपाही की गिरफ्तारी, राजस्थान पुलिस की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल,,
15 फरवरी को गिरफ्तार हुए अखिलेश त्रिपाठी एक अगस्त को जेल से बाहर आए, हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब आखिरकार मिली ड्यूटी जॉइनिंग

लखनऊ। राजस्थान पुलिस की कथित पहचान संबंधी चूक का खामियाजा उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सिपाही को 166 दिन तक जेल में रहकर भुगतना पड़ा। लखनऊ में तैनात सिपाही अखिलेश त्रिपाठी को राजस्थान के सवाई माधोपुर पुलिस ने धोखाधड़ी के एक मामले में 15 फरवरी 2026 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। बाद में सामने आया कि जिस अखिलेश त्रिपाठी के खिलाफ वारंट जारी था, उसकी करीब 26 वर्ष पहले यानी 1998 में ही मौत हो चुकी थी।
नाम एक होने के कारण राजस्थान पुलिस ने लखनऊ में तैनात सिपाही को ही आरोपी समझ लिया। इस कथित गलत पहचान के चलते एक निर्दोष पुलिसकर्मी को महीनों जेल में रहना पड़ा।
15 फरवरी को हुई थी गिरफ्तारी
जानकारी के मुताबिक राजस्थान के सवाई माधोपुर पुलिस ने एक धोखाधड़ी के मामले में जारी वारंट के आधार पर लखनऊ पहुंचकर अखिलेश त्रिपाठी को गिरफ्तार किया। पुलिस उन्हें राजस्थान ले गई, जहां उन्हें जेल भेज दिया गया।
सिपाही का कहना था कि वह उस मामले से संबंधित व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन कार्रवाई के दौरान उनकी पहचान और वारंट में दर्ज व्यक्ति की वास्तविक पहचान का पर्याप्त मिलान नहीं हो सका।
बाद में यह तथ्य सामने आया कि वारंट जिस अखिलेश त्रिपाठी के नाम पर था, उसकी वर्ष 1998 में ही मृत्यु हो चुकी थी। इसके बावजूद उसी नाम के आधार पर लखनऊ में तैनात पुलिसकर्मी को गिरफ्तार कर लिया गया।
166 दिन तक जेल में रहे
गलत पहचान की इस कार्रवाई का सबसे बड़ा असर सिपाही की जिंदगी पर पड़ा। अखिलेश त्रिपाठी को करीब 166 दिन जेल में रहना पड़ा। वह आखिरकार एक अगस्त 2026 को जेल से बाहर आए।
जेल से बाहर आने के बाद भी उनकी परेशानी खत्म नहीं हुई। उनकी तैनाती सुरक्षा वाहिनी में थी और ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए उन्हें विभागीय कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद मिली राहत
अखिलेश त्रिपाठी के पास मामले से संबंधित दस्तावेज और हाईकोर्ट का आदेश था। इसके बावजूद ड्यूटी जॉइन करने की प्रक्रिया में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा।
मामला सामने आने और खबर प्रकाशित होने के बाद विभागीय अधिकारी सक्रिय हुए। कमांडेंट ने सिपाही को बुलाया और उनके दस्तावेजों की जांच के बाद आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी कराई।
इसके बाद बृहस्पतिवार को अखिलेश त्रिपाठी की आखिरकार विभाग में आमद कर ली गई और उन्हें ड्यूटी जॉइन करा दी गई।
अब उठ रहे पहचान और पुलिस कार्रवाई पर सवाल
यह मामला पुलिस की जांच और गिरफ्तारी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। किसी व्यक्ति के खिलाफ जारी वारंट पर कार्रवाई करते समय उसकी उम्र, पता, पहचान, पिता का नाम और अन्य व्यक्तिगत विवरणों का मिलान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि वारंट जिस व्यक्ति के खिलाफ था, उसकी 1998 में ही मृत्यु हो चुकी थी, तो गिरफ्तारी से पहले उसकी पहचान का सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
एक ही नाम वाले दो व्यक्तियों के बीच अंतर स्पष्ट किए बिना की गई कार्रवाई ने एक कार्यरत पुलिसकर्मी को 166 दिन जेल में पहुंचा दिया।
अब इस मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि गलत गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी और इतने लंबे समय तक जेल में रहने वाले सिपाही को हुए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई कैसे होगी?
फिलहाल अखिलेश त्रिपाठी को ड्यूटी जॉइन करा दिया गया है और वह अपनी नियमित ड्यूटी करेंगे। हालांकि, 166 दिनों तक निर्दोष होते हुए जेल में रहने का यह मामला पुलिस व्यवस्था में पहचान सत्यापन और जवाबदेही की गंभीर आवश्यकता को सामने लाता है।



