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हरिद्वार में मीट कारोबार पर बड़ा सवाल! सप्लाई कम, खपत के दावे ज्यादा—बिलों से लेकर कथित अवैध कटान तक जांच के घेरे में कब आयेगा पूरा नेटवर्क,, रुड़की-मंगलौर से सलेमपुर, कलियर और ज्वालापुर तक उठे सवाल—कहां से आ रहा मीट? किसके बिल पर हो रही सप्लाई?  खपत के दावे और सीमित वैध सप्लाई के बीच कथित अंतर ने बढ़ाई जांच की मांग

हरिद्वार में मीट कारोबार पर बड़ा सवाल! सप्लाई कम, खपत के दावे ज्यादा—बिलों से लेकर कथित अवैध कटान तक जांच के घेरे में कब आयेगा पूरा नेटवर्क,,

रुड़की-मंगलौर से सलेमपुर, कलियर और ज्वालापुर तक उठे सवाल—कहां से आ रहा मीट? किसके बिल पर हो रही सप्लाई?  खपत के दावे और सीमित वैध सप्लाई के बीच कथित अंतर ने बढ़ाई जांच की मांग

हरिद्वार। रिपोर्ट: शाहनवाज खान।… हरिद्वार जिले में मीट कारोबार को लेकर एक बार फिर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। जिले में प्रतिदिन होने वाली कथित मीट खपत और बाहर से आने वाली वैध सप्लाई के आंकड़ों में बताए जा रहे भारी अंतर ने पूरी सप्लाई चेन को सवालों के घेरे में ला दिया है। मामला केवल मीट की दुकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि पशु खरीद, कटान, बिलिंग, परिवहन और बाजार तक पहुंचने वाले पूरे नेटवर्क की जांच की मांग उठ रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर बाहर से आने वाली वैध सप्लाई सीमित है और जिले में प्रतिदिन करीब 20 टन या उससे अधिक खपत होने का दावा किया जा रहा है, तो आखिर बाकी मीट कहां से आ रहा है? हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभागों से होना अभी बाकी है।

बिलों का खेल या वास्तविक सप्लाई?

बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, कैराना और आसपास की मीट फैक्ट्रियों से हरिद्वार के लिए वैध सप्लाई आती है। ऐसे में फैक्ट्रियों से जारी बिल, मीट की मात्रा, वाहन नंबर, परिवहन दस्तावेज और हरिद्वार में प्राप्त वास्तविक माल का मिलान किया जाना बेहद जरूरी है।

आरोप है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ बिलों के आधार पर वास्तविक सप्लाई से अधिक मात्रा कागजों में दिखाई जा रही हो? यदि जांच में दस्तावेज और वास्तविक सप्लाई में अंतर सामने आता है तो यह पूरे नेटवर्क की परतें खोल सकता है।

रुड़की-मंगलौर से सलेमपुर तक सवाल

रुड़की और मंगलौर क्षेत्र में कथित अवैध कटान को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि कुछ स्थानों पर अधिकृत व्यवस्था के बाहर पशुओं का कटान कर मीट तैयार किया जाता है और फिर इसे अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचाया जाता है।

सलेमपुर, कलियर, रुड़की और ज्वालापुर जैसे क्षेत्रों में मीट की आवक-जावक, दुकानों की वैधता, कटान के स्रोत और परिवहन दस्तावेजों की जांच किए जाने की मांग उठ रही है। यदि किसी स्थान पर अवैध कटान की पुष्टि होती है तो यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि वहां तैयार मीट किन दुकानों या विक्रेताओं तक पहुंचता है।

गौकशी की शिकायतें भी चिंता का कारण

मामले का संवेदनशील पहलू गौवंशीय पशुओं के अवैध कटान से जुड़ी शिकायतें भी हैं। भैंस वंशीय पशुओं के वैध कारोबार की आड़ में कहीं प्रतिबंधित पशुओं का कटान तो नहीं हो रहा—इसकी जांच भी आवश्यक बताई जा रही है। ऐसे मामलों में केवल मौके पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि पशु खरीद से लेकर कटान और अंतिम बिक्री तक की पूरी कड़ी खंगालनी होगी।

अब प्रशासन को देना होगा आंकड़ों का हिसाब

मीट कारोबार से जुड़े इन सवालों का जवाब अब कागजों की जांच से ही मिल सकता है। हरिद्वार में कुल वैध मीट सप्लाई कितनी है? प्रतिदिन वास्तविक खपत कितनी है? रुड़की-मंगलौर, सलेमपुर, कलियर और ज्वालापुर में कितने प्रतिष्ठानों को वैध अनुमति है? कितने पशुओं का अधिकृत कटान हुआ? वाहनों में कितनी मात्रा लाई गई और बिलों में कितनी दिखाई गई?

इन सभी बिंदुओं पर संयुक्त जांच होने पर ही तस्वीर साफ होगी।

अब निगाह प्रशासन, पुलिस, पशुपालन, खाद्य सुरक्षा और संबंधित विभागों पर है। जरूरत इस बात की है कि कार्रवाई सिर्फ छोटे विक्रेताओं तक सीमित न रहे, बल्कि कथित अवैध सप्लाई के स्रोत से लेकर बिलिंग और अंतिम बाजार तक पूरे नेटवर्क की जांच हो। यदि अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई हो और यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो आधिकारिक आंकड़ों के साथ स्थिति भी स्पष्ट की जाए।

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