मौत के दरवाजे पर मरीज… डॉक्टर ‘छुट्टी’ पर और अस्पताल का बोर्ड गायब! कोमल अल्फा नर्सिंग होम में अब उठ रहे साजिश के सवाल,, पहले इलाज और ऑपरेशन, फिर बिगड़ी महिला की हालत… हरिद्वार में बड़ी सर्जरी के बाद बची जान! अब दरवाजे पर ‘डॉक्टर छुट्टी पर हैं’ की पर्ची, बोर्ड फाड़कर स्टाफ गायब—स्वास्थ्य विभाग बताएगा कौन है जिम्मेदार? बोर्ड फाड़ा या हटाया? डॉ छुट्टी पर या अस्पताल से दूरी? अब ‘गायब’ अस्पताल की पूरी कहानी की जांच जरूरी
जांच से पहले अस्पताल का दरवाजा बंद और जिम्मेदार लोग अनुपस्थित नजर आएं—यह स्थिति खुद कई सवाल पैदा करती है।स्वास्थ्य विभाग को अब फाइल बंद नहीं, फाइल खोलनी होगी।

मौत के दरवाजे पर मरीज… डॉक्टर ‘छुट्टी’ पर और अस्पताल का बोर्ड गायब! कोमल अल्फा नर्सिंग होम में अब उठ रहे साजिश के सवाल,,
पहले इलाज और ऑपरेशन, फिर बिगड़ी महिला की हालत… हरिद्वार में बड़ी सर्जरी के बाद बची जान! अब दरवाजे पर ‘डॉक्टर छुट्टी पर हैं’ की पर्ची, बोर्ड फाड़कर स्टाफ गायब—स्वास्थ्य विभाग बताएगा कौन है जिम्मेदार?
बोर्ड फाड़ा या हटाया? डॉ छुट्टी पर या अस्पताल से दूरी? अब ‘गायब’ अस्पताल की पूरी कहानी की जांच जरूरी

हरिद्वार। जिस अस्पताल के दरवाजे पर कभी बड़े-बड़े दावों वाला बोर्ड लगा था, आज उसी दरवाजे पर एक छोटी सी पर्ची चस्पा है—“डॉक्टर छुट्टी पर हैं।” बाहर सन्नाटा है, बोर्ड का नामोनिशान नहीं और कथित तौर पर पूरा स्टाफ भी दिखाई नहीं दे रहा। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि डॉक्टर छुट्टी पर क्यों हैं? असली सवाल यह है कि जिस महिला की हालत कथित ऑपरेशन के बाद इतनी बिगड़ गई कि उसे हरिद्वार में बड़ी सर्जरी कराकर बचाने की कोशिश करनी पड़ी, उसके इलाज की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
कोमल अल्फा नर्सिंग होम से जुड़े इस मामले में अब तस्वीरें कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। पहले अस्पताल के बाहर लगा बोर्ड नजर आया, जिसमें नर्सिंग होम का नाम, डॉक्टरों की डिग्री और 24 घंटे सेवा जैसे दावे दिखाई दे रहे थे। अब सामने आई तस्वीर में वही बोर्ड गायब है और दरवाजे पर हाथ से लिखी पर्ची चिपकी नजर आ रही है—“डॉक्टर छुट्टी पर हैं।”
यह बदलाव सामान्य है या पूरे मामले के बीच अचानक पैदा हुई परिस्थितियों का हिस्सा? इसका जवाब अब स्वास्थ्य विभाग की जांच से ही सामने आ सकता है।
C-Section किसने किया? BAMS डिग्री पर सबसे बड़ा सवाल—अब लाइसेंस, डॉक्टर, अनुमति और ऑपरेशन की पूरी फाइल खुले
मामले की शुरुआत पीड़ित पति तस्लीम की शिकायत से हुई, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी की डिलीवरी के दौरान पहले सामान्य प्रसव की बात कही गई, लेकिन बाद में C-Section यानी सिजेरियन ऑपरेशन किया गया। इसके बाद महिला की हालत बिगड़ने और पेट में संक्रमण एवं मवाद जैसी गंभीर समस्या पैदा होने का आरोप है।
हालात इतने गंभीर बताए गए कि महिला को बचाने के लिए बाद में बड़ी सर्जरी करनी पड़ी।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—ऑपरेशन किस डॉक्टर ने किया?
अस्पताल के बोर्ड पर डॉक्टरों की योग्यता को लेकर जो जानकारी दिखाई देती थी, उसमें BAMS डिग्री का उल्लेख नजर आता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने यह स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि संबंधित चिकित्सक की पंजीकरण स्थिति क्या थी, अस्पताल किस श्रेणी में पंजीकृत था, वहां किस प्रकार की चिकित्सा सेवाओं की अनुमति थी और C-Section जैसे ऑपरेशन के लिए आवश्यक विशेषज्ञता एवं वैधानिक अनुमति मौजूद थी या नहीं।
यह फैसला किसी खबर या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेजी जांच के आधार पर होना चाहिए।
बोर्ड फाड़ा या हटाया? डॉक्टर छुट्टी पर या अस्पताल से दूरी? अब ‘गायब’ अस्पताल की पूरी कहानी की जांच जरूरी
सबसे ज्यादा सवाल अब अस्पताल के बाहर की बदली हुई तस्वीर को लेकर उठ रहे हैं।
पहले जहां “कोमल अल्फा नर्सिंग होम” का बड़ा बोर्ड लगा दिखाई देता था, अब वहां बोर्ड नहीं है। दरवाजा बंद है और उस पर हाथ से लिखी पर्ची चिपकी है—“डॉक्टर छुट्टी पर हैं।”
अगर डॉक्टर वास्तव में छुट्टी पर हैं तो अस्पताल की सेवाएं किसके जिम्मे हैं?
अगर अस्पताल बंद है तो इसकी सूचना मरीजों और स्वास्थ्य विभाग को दी गई या नहीं?
अगर केवल डॉक्टर अनुपस्थित हैं तो स्टाफ कहां है?
और सबसे महत्वपूर्ण—जिस मरीज के परिजन गंभीर आरोप लगा रहे हैं, उनकी शिकायत की जांच पूरी होने से पहले अस्पताल का इस तरह निष्क्रिय नजर आना महज संयोग है या प्रशासनिक स्तर पर इसकी कोई वजह है?
इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना होगा।
बोर्ड हट जाना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है और डॉक्टर का छुट्टी पर होना भी अपराध नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस समय किसी निजी अस्पताल पर गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप सामने आए हों, उसी समय अस्पताल की गतिविधियों में अचानक बदलाव दिखाई दे तो जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
क्योंकि जांच सिर्फ बयान लेकर पूरी नहीं होनी चाहिए।
स्वास्थ्य विभाग को जरूरत पड़े तो अस्पताल का रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस, डॉक्टरों की डिग्री व पंजीकरण, ऑपरेशन थिएटर की अनुमति, C-Section से संबंधित रिकॉर्ड, मरीज की फाइल, प्री-ऑपरेटिव और पोस्ट-ऑपरेटिव रिपोर्ट, दवाइयों का रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट, एनेस्थीसिया रिकॉर्ड, स्टाफ की ड्यूटी सूची और CCTV फुटेज तक खंगालना चाहिए।
साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि महिला की हालत बिगड़ने के बाद उसे कहां रेफर किया गया और वहां डॉक्टरों ने उसकी स्थिति के बारे में क्या चिकित्सकीय निष्कर्ष दर्ज किए।
अब सवाल कार्रवाई का नहीं, जवाबदेही का है
पीड़ित पति तस्लीम की शिकायत में उठाए गए सवालों का निष्पक्ष जवाब मिलना जरूरी है। उनका कहना है कि “आज मेरे साथ हुआ है, कल किसी और के साथ न हो।” यही इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पक्ष है।
अगर जांच में अस्पताल या किसी चिकित्सक की गलती सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। अगर आरोप गलत पाए जाते हैं तो संबंधित अस्पताल और डॉक्टर को भी अपना पक्ष रखने और अपनी प्रतिष्ठा स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है।
लेकिन जांच से पहले अस्पताल का दरवाजा बंद और जिम्मेदार लोग अनुपस्थित नजर आएं—यह स्थिति खुद कई सवाल पैदा करती है।
अब गेंद स्वास्थ्य विभाग के पाले में है।
क्या विभाग मौके का निरीक्षण करेगा?
क्या अस्पताल का लाइसेंस और पंजीकरण जांचा जाएगा?
क्या C-Section की वैधानिकता और उसे करने वाले डॉक्टर की योग्यता की जांच होगी?
क्या मरीज की मेडिकल फाइल कब्जे में लेकर विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड से परीक्षण कराया जाएगा?
और यदि प्रथम दृष्टया गंभीर अनियमितता मिलती है तो क्या मुकदमा दर्ज कराकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस महिला ने कथित चिकित्सा प्रक्रिया के बाद जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया, उसे इंसाफ कौन देगा?
अब यह मामला सिर्फ एक अस्पताल का नहीं रहा। यह सवाल बन चुका है कि हरिद्वार में मरीज की जिंदगी के साथ इलाज के नाम पर कोई समझौता तो नहीं हो रहा?
स्वास्थ्य विभाग को अब फाइल बंद नहीं, फाइल खोलनी होगी।
नोट: इस रिपोर्ट में अस्पताल/चिकित्सकों से जुड़े आरोपों को शिकायत और उपलब्ध तस्वीरों के आधार पर सवाल के रूप में रखा गया है। आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही मानी जाएगी।



