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गड्ढों में सड़क… सड़क पर गुस्सा!वोट के वक्त नेताओं के हाथ जुड़े… अब जनता गड्ढों में रोए! जल जीवन मिशन ने खोदी सड़क, मरम्मत के नाम पर मिली सिर्फ खामोशी–डेढ़ साल से टूटी सड़क पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा, धूप में धरने पर बैठे मौ. सलीम—बोले, “जनप्रतिनिधियों की नींद कब टूटेगी?”

घिस्सुपुरा में जल जीवन मिशन के बाद बदहाल हुई सड़क का मुद्दा गरमाया, ग्रामीणों का आरोप—पाइपलाइन बिछाने के बाद सड़क की मरम्मत नहीं हुई; गड्ढों ने बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की राह की मुश्किल

गड्ढों में सड़क… सड़क पर गुस्सा!वोट के वक्त नेताओं के हाथ जुड़े… अब जनता गड्ढों में रोए!

जल जीवन मिशन ने खोदी सड़क, मरम्मत के नाम पर मिली सिर्फ खामोशी–डेढ़ साल से टूटी सड़क पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा, धूप में धरने पर बैठे मौ. सलीम—बोले, “जनप्रतिनिधियों की नींद कब टूटेगी?”

घिस्सुपुरा में जल जीवन मिशन के बाद बदहाल हुई सड़क का मुद्दा गरमाया, ग्रामीणों का आरोप—पाइपलाइन बिछाने के बाद सड़क की मरम्मत नहीं हुई; गड्ढों ने बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों की राह की मुश्किल

घिस्सुपुरा, हरिद्वार।
सड़क टूटी… गड्ढे गहरे… राह मुश्किल… और जिम्मेदार खामोश! ग्राम पंचायत धनपुरा के गांव घिस्सुपुरा में बदहाल सड़क को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा अब सड़क पर उतर आया है। हाथों में तख्तियां, जुबान पर सवाल और आंखों में नाराजगी लेकर ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया। सामाजिक कार्यकर्ता मौ. सलीम भी ग्रामीणों के साथ तेज धूप में सड़क पर धरने पर बैठ गए।ग्रामीणों ने नारे लगाते हुए सवाल उठाया कि वोट मांगने के समय हाथ जोड़ने वाले जनप्रतिनिधि आखिर अब कहां हैं? डेढ़ साल से सड़क की हालत खराब है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।

मामला जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़क की गई खुदाई से जुड़ा बताया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार पाइपलाइन डालने के बाद सड़क को पहले की स्थिति में दुरुस्त किया जाना था, लेकिन डेढ़ साल गुजरने के बाद भी सड़क की समुचित मरम्मत नहीं हो सकी।

गड्ढों में तब्दील सड़क… बारिश में बन जाती है आफत

ग्रामीणों का कहना है कि घिस्सुपुरा की मुख्य सड़क जगह-जगह से टूट चुकी है। सड़क पर बने गहरे गड्ढे राहगीरों के लिए मुसीबत बने हुए हैं। बारिश होने पर स्थिति और भी खराब हो जाती है और गड्ढों में पानी भर जाने से सड़क की वास्तविक स्थिति दिखाई नहीं देती।

बच्चे स्कूल जाएं तो डर, बुजुर्ग निकलें तो डर, मरीज को अस्पताल ले जाएं तो डर।

ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार बच्चे और साइकिल सवार गड्ढों में गिरकर चोटिल हो चुके हैं। बुजुर्गों और मरीजों के लिए यह रास्ता और भी बड़ी परेशानी बन गया है। सबसे गंभीर बात यह बताई जा रही है कि करीब दो-तीन दिन पहले एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद जनाजा ले जाते समय भी ग्रामीणों को इसी बदहाल सड़क से गुजरना पड़ा। ग्रामीणों के अनुसार रास्ते की खराब हालत के चलते जनाजा संभालने में परेशानी हुई और जनाजा गिरने जैसी स्थिति तक पैदा हो गई। इस घटना ने ग्रामीणों की नाराजगी को और बढ़ा दिया है।

“विकास योजना आई थी, लेकिन सड़क ही ले गई!”

ग्रामीणों का सवाल सीधा है—अगर किसी विकास योजना के लिए सड़क खोदी जाती है तो काम पूरा होने के बाद सड़क को पहले जैसा बनाना किसकी जिम्मेदारी है?

ग्रामीणों का कहना है कि जल जीवन मिशन लोगों को पानी उपलब्ध कराने की योजना है, लेकिन पाइपलाइन बिछाने के बाद यदि गांव की सड़क ही बदहाल हो जाए तो लोगों को राहत के साथ परेशानी भी क्यों झेलनी पड़े?

ग्रामीणों के मुताबिक सड़क की समस्या को लेकर संबंधित लोगों और अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। आश्वासन मिलते रहे, मगर सड़क की हालत नहीं बदली।

धूप में धरने पर बैठे मौ. सलीम, बोले—“आश्वासन नहीं, सड़क चाहिए”

सामाजिक कार्यकर्ता मौ. सलीम ग्रामीणों के साथ करीब आधे घंटे तक तेज धूप में सड़क पर धरने पर बैठे। उन्होंने कहा कि ग्रामीण लंबे समय से इस समस्या को झेल रहे हैं और अब केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा।

उन्होंने जनप्रतिनिधियों को निशाने पर लेते हुए कहा—

“जागो जनप्रतिनिधियो, जागो! धनपुरा की यह बदहाली देखो। ग्रामीण डेढ़ साल से परेशान हैं। सड़क की हालत ऐसी है कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों और मरीजों तक को परेशानी हो रही है। अब सिर्फ आश्वासन नहीं, सड़क की मरम्मत चाहिए।”

मौ. सलीम ने कहा कि यदि जल्द सड़क की मरम्मत नहीं कराई गई तो ग्रामीण लोकतांत्रिक तरीके से बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

जनता के पांच सवाल—जवाब कौन देगा?

ग्रामीणों ने जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधियों के सामने कई सवाल खड़े किए हैं—

पहला सवाल: डेढ़ साल से सड़क खराब है तो अब तक मरम्मत क्यों नहीं हुई?

दूसरा सवाल: जल जीवन मिशन के तहत सड़क खोदी गई थी तो उसे पहले जैसी स्थिति में बहाल करने की जिम्मेदारी किसकी है?

तीसरा सवाल: क्या संबंधित अधिकारी मौके का निरीक्षण कर सड़क की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तैयार करेंगे?

चौथा सवाल: बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को रोज होने वाली परेशानी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

पांचवां सवाल: आखिर कब तक ग्रामीण गड्ढों के बीच चलने को मजबूर रहेंगे?


डेढ़ साल का इंतजार… अब कार्रवाई का इंतजार

घिस्सुपुरा के ग्रामीणों की नाराजगी अब केवल सड़क के गड्ढों तक सीमित नहीं रह गई है। मामला जवाबदेही का बन चुका है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब सड़क बनाने और मरम्मत करने के लिए सरकारी योजनाएं और बजट मौजूद हैं तो जमीन पर सड़क बदहाल क्यों है?

एक तरफ विकास कार्यों की तस्वीरें सामने आती हैं, दूसरी तरफ घिस्सुपुरा जैसे गांवों में ग्रामीण टूटे रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं।

जनता का सवाल साफ है—वोट मांगने के समय जो हाथ जनता के सामने जुड़ते हैं, क्या वही हाथ अब सड़क की मरम्मत के लिए भी उठेंगे?

ग्रामीणों ने मांग की है कि संबंधित विभाग मौके पर पहुंचकर सड़क का निरीक्षण करे और बिना किसी और देरी के सड़क की मरम्मत कराई जाए, ताकि बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और आम राहगीरों को राहत मिल सके।

“वोट के वक्त हाथ जुड़े… अब जनता गड्ढों में रोए—आखिर जिम्मेदार कब जागेंगे?”

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