झिलमिल झील रिजर्व ने रचा नया इतिहास: जंगल सफारी बनी पर्यटकों की पहली पसंद, पांच साल में कमाए ₹1.23 करोड़,, स्वैम्प डियर, हाथी, मगरमच्छ और दुर्लभ पक्षियों का अनोखा संसार खींच रहा देश-विदेश के सैलानियों को,, ईको-टूरिज्म को मिली नई उड़ान, वन विभाग की बेहतर व्यवस्थाओं से हर साल बढ़ रही पर्यटकों की संख्या

झिलमिल झील रिजर्व ने रचा नया इतिहास: जंगल सफारी बनी पर्यटकों की पहली पसंद, पांच साल में कमाए ₹1.23 करोड़,,
स्वैम्प डियर, हाथी, मगरमच्छ और दुर्लभ पक्षियों का अनोखा संसार खींच रहा देश-विदेश के सैलानियों को,,
ईको-टूरिज्म को मिली नई उड़ान, वन विभाग की बेहतर व्यवस्थाओं से हर साल बढ़ रही पर्यटकों की संख्या
हरिद्वार। हरिद्वार वन प्रभाग के अंतर्गत स्थित झिलमिल झील संरक्षण रिजर्व (Jhilmil Jheel Conservation Reserve) आज उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय ईको-टूरिज्म स्थलों में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध जैव विविधता और रोमांचक जंगल सफारी के कारण यह रिजर्व लगातार पर्यटकों की पहली पसंद बनता जा रहा है। बीते पांच वर्षों में जंगल सफारी और पर्यटन गतिविधियों से लगभग 1.23 करोड़ रुपये की आय अर्जित कर इस संरक्षण क्षेत्र ने नया रिकॉर्ड बनाया है। हाल के वर्षों में यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।
झिलमिल झील संरक्षण रिजर्व अपनी अनूठी जैव विविधता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र विशेष रूप से बारहसिंगा (स्वैम्प डियर) के सबसे बड़े प्राकृतिक आवासों में गिना जाता है। इसके अलावा यहां जंगली हाथी, मगरमच्छ, तेंदुआ, सांभर, चीतल, नीलगाय तथा अनेक दुर्लभ वन्यजीव और पक्षियों की प्रजातियां पर्यटकों को सहज रूप से देखने को मिलती हैं। यही कारण है कि वन्यजीव प्रेमियों, फोटोग्राफरों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं माना जाता।
वन विभाग द्वारा संचालित जंगल सफारी में पर्यटकों को प्रशिक्षित गाइडों के साथ सुरक्षित तरीके से जंगल भ्रमण कराया जाता है। सफारी के दौरान घास के विशाल मैदान, दलदली क्षेत्र, प्राकृतिक जलाशय और घने जंगल पर्यटकों को रोमांच से भर देते हैं। विशेष रूप से सर्दियों के मौसम में यहां प्रवासी पक्षियों की अनेक प्रजातियां भी पहुंचती हैं, जिससे बर्ड वॉचिंग के शौकीनों के लिए यह स्थान और भी आकर्षक बन जाता है। वन विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की सुविधाओं में लगातार सुधार किया है। ऑनलाइन बुकिंग, प्रशिक्षित गाइड, सुरक्षित सफारी मार्ग, बेहतर वाहन व्यवस्था, सूचना केंद्र तथा पर्यावरण संरक्षण संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों ने यहां के पर्यटन को नई पहचान दी है। इन प्रयासों का सीधा असर पर्यटकों की बढ़ती संख्या और पर्यटन से होने वाली आय पर दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि झिलमिल झील संरक्षण रिजर्व केवल पर्यटन का केंद्र नहीं बल्कि जैव विविधता संरक्षण का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। यहां वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाकर ईको-टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी विकसित हुए हैं। सफारी संचालन, गाइड सेवा, स्थानीय परिवहन तथा पर्यटन से जुड़े अन्य कार्यों में आसपास के ग्रामीणों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
वन विभाग का उद्देश्य केवल राजस्व अर्जित करना नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना भी है। इसी सोच के तहत यहां आने वाले पर्यटकों को जंगल के नियमों, वन्यजीवों के संरक्षण और प्रकृति के महत्व के बारे में जानकारी दी जाती है ताकि पर्यटन के साथ-साथ संरक्षण की भावना भी मजबूत हो। उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन के साथ अब प्राकृतिक पर्यटन भी तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। हरिद्वार आने वाले बड़ी संख्या में श्रद्धालु अब झिलमिल झील संरक्षण रिजर्व की जंगल सफारी का भी आनंद ले रहे हैं। इससे स्थानीय पर्यटन उद्योग को नई गति मिली है और राज्य की ईको-टूरिज्म नीति को भी मजबूती मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी प्रकार बेहतर प्रबंधन, वन्यजीव संरक्षण और पर्यटक सुविधाओं का विस्तार जारी रहा तो आने वाले वर्षों में झिलमिल झील संरक्षण रिजर्व देश के प्रमुख जंगल सफारी स्थलों में अपनी और मजबूत पहचान स्थापित करेगा। पांच वर्षों में 1.23 करोड़ रुपये की आय और लगातार बढ़ती पर्यटकों की संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि झिलमिल झील अब केवल एक संरक्षण क्षेत्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड के ईको-टूरिज्म का उभरता हुआ गौरव बन चुकी है।



