मनरेगा में बड़ा फर्जीवाड़ा बेनकाब! परिवहन विभाग का संविदा परिचालक बना मनरेगा मजदूर,, लोकपाल की जांच में खुलासा: सरकारी नौकरी करते हुए लिया मनरेगा का भुगतान, ₹19,754 राजकोष में लौटाने पड़े,, ग्राम रोजगार सहायक और तत्कालीन ग्राम विकास अधिकारी पर जुर्माना, नारसन बीडीओ को सख्त अनुपालन के निर्देश; मनरेगा व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

मनरेगा में बड़ा फर्जीवाड़ा बेनकाब! परिवहन विभाग का संविदा परिचालक बना मनरेगा मजदूर,,
लोकपाल की जांच में खुलासा: सरकारी नौकरी करते हुए लिया मनरेगा का भुगतान, ₹19,754 राजकोष में लौटाने पड़े,,
ग्राम रोजगार सहायक और तत्कालीन ग्राम विकास अधिकारी पर जुर्माना, नारसन बीडीओ को सख्त अनुपालन के निर्देश; मनरेगा व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
हरिद्वार, 08 जुलाई 2026। हरिद्वार जिले के विकासखंड नारसन की ग्राम पंचायत पीरपुरा में मनरेगा कार्यों में कथित अनियमितताओं की जांच ने सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराना है, उसी योजना में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। जांच में खुलासा हुआ कि परिवहन विभाग के हरिद्वार डिपो में संविदा परिचालक के रूप में कार्यरत व्यक्ति को मनरेगा मजदूर दिखाकर भुगतान कर दिया गया।
लोकपाल मनरेगा की जांच में सामने आए तथ्यों के बाद संबंधित व्यक्ति से ₹19,754 की पूरी राशि राजकोष में वापस जमा कराई गई, जबकि ग्राम पंचायत स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी कार्रवाई करते हुए ग्राम रोजगार सहायक और तत्कालीन ग्राम विकास अधिकारी पर ₹1-1 हजार का जुर्माना लगाया गया है।
यह पूरा मामला विकासखंड नारसन की ग्राम पंचायत पीरपुरा से जुड़ा है, जहां ग्रामीण फिरोज, अकील, तौकिर, राशिद और इकबाल ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि ग्राम पंचायत निधि और सरकारी भूमि का दुरुपयोग किया गया, तालाब की मिट्टी का अवैध रूप से विक्रय किया गया तथा मनरेगा के तहत फर्जी तरीके से भुगतान किए गए। शिकायतकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि हरिद्वार डिपो में संविदा परिचालक के पद पर कार्यरत वसीम पुत्र इदरीश को मनरेगा मजदूर दर्शाकर सरकारी धन का भुगतान किया गया, जबकि वह पहले से ही परिवहन विभाग में कार्यरत था।
शिकायत मिलने के बाद उप जिला कार्यक्रम समन्वयक एवं जिला विकास अधिकारी के माध्यम से मामला लोकपाल मनरेगा बी.एस. नेगी के समक्ष पहुंचा। लोकपाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए 29 मई 2026 को स्थलीय निरीक्षण कराया। जांच के दौरान अभिलेखों का गहन सत्यापन किया गया और तकनीकी जांच में अपर सहायक अभियंता, लघु सिंचाई विभाग अरविंद कुमार भास्कर का सहयोग लिया गया।
जांच के दौरान शिकायतकर्ताओं ने मनरेगा के तहत बनी सड़कों की गुणवत्ता की भी जांच कराने और कोर कटिंग की मांग रखी। हालांकि लोकपाल ने स्पष्ट किया कि मनरेगा वार्षिक मास्टर सर्कुलर-2024 के अनुसार पांच लाख रुपये से कम लागत वाले कार्यों में कोर कटिंग का कोई प्रावधान नहीं है। चूंकि संबंधित सभी कार्य पांच लाख रुपये से कम लागत के पाए गए, इसलिए इस मांग को नियमों के अनुरूप स्वीकार नहीं किया जा सका।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला तथ्य तब सामने आया जब वसीम ने स्वयं स्वीकार किया कि उनसे त्रुटिवश मनरेगा के तहत भुगतान प्राप्त हुआ था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024-25 के बाद उन्होंने मनरेगा के अंतर्गत कोई कार्य नहीं किया और लोकपाल कार्यालय की कार्रवाई के बाद उन्हें प्राप्त ₹19,754 की पूरी धनराशि खंड विकास अधिकारी, नारसन के कार्यालय में राजकोष में जमा करा दी। उन्होंने भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न होने का आश्वासन देते हुए खेद भी व्यक्त किया।
हालांकि केवल धनराशि वापस जमा करा देने से मामला समाप्त नहीं हुआ। लोकपाल ने अपने आदेश में स्पष्ट टिप्पणी की कि संबंधित व्यक्ति उसी अवधि में परिवहन विभाग के हरिद्वार डिपो में संविदा परिचालक के रूप में कार्यरत था, फिर भी उसे मनरेगा मजदूर दर्शाकर भुगतान किया गया। यह स्थिति ग्राम पंचायत स्तर पर रिकॉर्ड के सत्यापन, मस्टर रोल की निगरानी और भुगतान प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही को दर्शाती है। लोकपाल ने कहा कि यह मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना की पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वसनीयता के विपरीत है।
जांच में दोषी पाए जाने पर ग्राम पंचायत पीरपुरा के ग्राम रोजगार सहायक पर गलत मस्टर रोल में उपस्थिति दर्ज करने और गलत भुगतान की संस्तुति करने के लिए ₹1,000 का जुर्माना लगाया गया। वहीं तत्कालीन ग्राम विकास अधिकारी पर भी ₹1,000 का आर्थिक दंड लगाया गया। इसके साथ ही खंड विकास अधिकारी, नारसन को निर्देश दिए गए हैं कि दंडादेश का नियमानुसार अनुपालन सुनिश्चित कर निर्धारित अवधि के भीतर इसकी विस्तृत आख्या लोकपाल कार्यालय को उपलब्ध कराई जाए।
यह मामला केवल एक व्यक्ति द्वारा राशि लौटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि यदि शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो तो मनरेगा जैसी योजनाओं में छिपी अनियमितताएं भी सामने लाई जा सकती हैं। ग्रामीणों द्वारा उठाए गए सवालों ने प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर किया और जांच ने यह साबित किया कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है।
मनरेगा में सामने आया यह खुलासा अब जिले भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ भविष्य में भी इसी प्रकार सख्त कार्रवाई जारी रहेगी, ताकि पात्र लाभार्थियों के अधिकारों की रक्षा हो सके और सरकारी धन का दुरुपयोग किसी भी कीमत पर बर्दाश्त न किया जाए।



