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नकली दवाओं के ‘डिजिटल मौत कारोबार’ पर एसटीएफ की सर्जिकल स्ट्राइक! ऑनलाइन फर्जी मेडिसिन सिंडिकेट का भंडाफोड़, कई राज्यों तक फैला था जहर का नेटवर्क,, “आधी कीमत में जिंदगी का सौदा!” — फेसबुक पेज से बिक रही थीं ब्रांडेड कंपनियों की नकली दवाएं, एसटीएफ के ऑपरेशन ‘फेक पिल’ में दो आरोपी गिरफ्तार,, “जब सख्ती गई तो माफिया मुस्कराए?” — हरिद्वार में कभी दवा माफियाओं की धड़कन बढ़ाने वाली कार्रवाई अब क्यों हुई धीमी, पूर्व ड्रग्स इंस्पेक्टर अनीता भारती की दवा माफियाओं पर दबंग कार्यशैली फिर चर्चा में,,

इन्तजार रजा हरिद्वार- नकली दवाओं के ‘डिजिटल मौत कारोबार’ पर एसटीएफ की सर्जिकल स्ट्राइक! ऑनलाइन फर्जी मेडिसिन सिंडिकेट का भंडाफोड़, कई राज्यों तक फैला था जहर का नेटवर्क,,

“आधी कीमत में जिंदगी का सौदा!” — फेसबुक पेज से बिक रही थीं ब्रांडेड कंपनियों की नकली दवाएं, एसटीएफ के ऑपरेशन ‘फेक पिल’ में दो आरोपी गिरफ्तार,,

“जब सख्ती गई तो माफिया मुस्कराए?” — हरिद्वार में कभी दवा माफियाओं की धड़कन बढ़ाने वाली कार्रवाई अब क्यों हुई धीमी, पूर्व ड्रग्स इंस्पेक्टर अनीता भारती की दवा माफियाओं पर दबंग कार्यशैली फिर चर्चा में,,

हरिद्वार/देहरादून, 22 मई। उत्तराखंड एसटीएफ ने एक ऐसे खतरनाक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया है जो सिर्फ कानून नहीं तोड़ रहा था, बल्कि सीधे इंसानी जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहा था। यह कोई साधारण धोखाधड़ी नहीं, बल्कि “मौत के कारोबार” का डिजिटल मॉडल था, जहां सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर में नकली जीवनरक्षक दवाइयां बेची जा रही थीं।

मुख्यमंत्री के ड्रग्स फ्री देवभूमि अभियान और डीजीपी दीपम सेठ के निर्देशों के बाद एसटीएफ ने Operation Fake Pill के तहत दो महीने तक गुप्त निगरानी और तकनीकी इनपुट विकसित किए। इसके बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने जांच एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए।

जांच में पता चला कि एसके हेल्थ केयर नाम के फेसबुक पेज के जरिए बड़ी-बड़ी नामी दवा कंपनियों की हूबहू नकली दवाएं आधे से भी कम कीमत पर ऑनलाइन बेची जा रही थीं। गिरोह सिर्फ दवा नहीं बेच रहा था, बल्कि लोगों की जिंदगी के साथ एक खतरनाक जुआ खेल रहा था।

एसटीएफ ने जब काल्पनिक ग्राहक बनकर इन दवाओं को मंगवाया तो सच्चाई सामने आ गई। Gudcef Plus और Tydol 100 जैसी दवाइयों के नकली पैकेट कोरियर के जरिए देहरादून भेजे गए। जांच में सामने आया कि इन दवाओं की पैकिंग से लेकर ब्रांडिंग तक सब कुछ असली जैसा तैयार किया गया था ताकि ग्राहक धोखा खा जाए।

इस गिरोह का नेटवर्क बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, चंडीगढ़, पंजाब और उत्तराखंड तक फैला हुआ था। नकली दवाइयों का यह कारोबार ऑनलाइन दुनिया में इतनी सफाई से चलाया जा रहा था कि कई मेडिकल विक्रेता भी सस्ते रेट और ज्यादा मुनाफे के लालच में इनके जाल में फंस रहे थे।

एसटीएफ ने जतिन सैनी और गौरव त्यागी को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में जो खुलासे हुए, वे और भी चौंकाने वाले हैं। आरोपी गौरव त्यागी ने बताया कि रुड़की में उसकी फैक्ट्री पहले भी नकली दवा बनाने में पकड़ी जा चुकी थी। इसके बाद उसने भगवानपुर क्षेत्र और कोटद्वार के बंद पड़े यूनिट्स का इस्तेमाल कर फिर से यह खेल शुरू कर दिया।

सूत्रों के मुताबिक, जब दवा बनानी होती थी तो बंद फैक्ट्री का ताला खुलता था, नकली दवा तैयार होती थी और फिर फैक्ट्री दोबारा बंद कर दी जाती थी। यानी “अस्थायी फैक्ट्री, स्थायी अपराध” का पूरा मॉडल खड़ा किया गया था।

एसटीएफ ने संबंधित धाराओं के तहत संगठित अपराध, धोखाधड़ी, जालसाजी, पहचान चोरी, आईटी एक्ट, कॉपीराइट एक्ट और एनडीपीएस एक्ट में मुकदमा दर्ज किया है। साथ ही कोटद्वार यूनिट को सीज करने और फॉरेंसिक जांच की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।

लेकिन इस पूरे मामले के बाद एक सवाल हरिद्वार में फिर चर्चा का विषय बन गया है—क्या जिले में दवा माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की रफ्तार धीमी हुई है?

हरिद्वार में नकली दवाओं के बड़े खुलासे के बाद एक बार फिर पूर्व ड्रग्स इंस्पेक्टर अनीता भारती की कार्यशैली चर्चा में आ गई है। स्थानीय हलकों में चर्चा है कि जब तक अनीता भारती हरिद्वार में तैनात रहीं, दवा माफियाओं के खिलाफ लगातार छापेमारी और सख्त कार्रवाई देखने को मिलती थी। उनके कार्यकाल में कई मामलों पर विभाग की सक्रियता सुर्खियों में रही। अब एसटीएफ की कार्रवाई के बाद कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या स्थानीय स्तर पर पहले जैसी सख्ती दिखाई दे रही है या नहीं। हालांकि यह जनचर्चा का विषय है, आधिकारिक पुष्टि नहीं।

स्थानीय हलकों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि जब तक अनिता भारती हरिद्वार में सक्रिय थीं, तब तक दवा माफियाओं के बीच लगातार डर बना रहता था। अक्सर छापेमारी, जांच और कार्रवाई की खबरें सामने आती थीं। अब कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर विभागीय सक्रियता पहले जैसी दिखाई क्यों नहीं दे रही?

हालांकि यह व्यक्तिगत आरोप या आधिकारिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि प्रशासनिक हलकों और जनचर्चाओं में उठ रही प्रतिक्रियाओं का हिस्सा है। मगर इतना जरूर है कि कुछ अधिकारी अपनी कुर्सी से पहचाने जाते हैं, जबकि कुछ अपने काम से पहचान बना जाते हैं। फिलहाल एसटीएफ की कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अपराध चाहे सोशल मीडिया की आड़ में हो या ऑनलाइन बाजार में — कानून की पकड़ देर से सही, लेकिन पहुंचती जरूर है।

एसटीएफ की जनता से अपील भी बेहद अहम है:

  • बिना बिल दवा न खरीदें
  • बैच नंबर का मिलान करें
  • अधिक छूट के लालच से बचें
  • अनजान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से दवा न लें
  • संदिग्ध जानकारी तुरंत एसटीएफ और ड्रग विभाग को दें

क्योंकि सस्ती दवा हर बार सस्ता सौदा नहीं होती… कई बार उसकी कीमत जिंदगी से चुकानी पड़ती है।

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