नये सीईओ, पुराने गुनाह! कलियर में गोलक गबन कांड: निलंबित कर्मचारियों/अफसरों के चेहरे खिले, सिस्टम पर फिर सवाल हो रहे जिन्दा क्या अब हो गई बहाली की तैयारी है? हरिद्वार से देहरादून तक फाइलों में ‘गर्माहट’,, सीईओ आरिफ के आते ही सक्रिय हुआ ‘बहाली लॉबी’,, निलंबित कर्मचारियों के लिए क्या नया सीईओ/नई व्यवस्था बन जाएगी बहाली की ढाल?

इन्तजार रजा हरिद्वार- नये सीईओ, पुराने गुनाह!
कलियर में गोलक गबन कांड: निलंबित कर्मचारियों/अफसरों के चेहरे खिले, सिस्टम पर फिर सवाल हो रहे जिन्दा
क्या अब हो गई बहाली की तैयारी है? हरिद्वार से देहरादून तक फाइलों में ‘गर्माहट’,,
सीईओ आरिफ के आते ही सक्रिय हुआ ‘बहाली लॉबी’,,
निलंबित कर्मचारियों के लिए क्या नया सीईओ/नई व्यवस्था बन जाएगी बहाली की ढाल?

वक्फ बोर्ड के नए सीईओ के रूप में आरिफ के पदभार संभालते ही कलियर दरगाह में गोलक गबन कांड से जुड़े निलंबित अधिकारियों और कर्मचारियों के खेमे में अचानक हलचल तेज हो गई है। जिन चेहरों पर कल तक निलंबन की चिंता साफ झलकती थी, आज वही चेहरे उम्मीदों की मुस्कान से चमकते दिख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या नया सीईओ आते ही पुराने घोटालों पर पर्दा डालने की तैयारी शुरू हो गई है?
सूत्रों की मानें तो गोलक गबन कांड में जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को गंभीर आरोपों के चलते निलंबित किया गया था, वे अब अपनी बहाली के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने में जुट गए हैं। चर्चाएं यहां तक हैं कि हरिद्वार से देहरादून तक फाइलें गर्म हो चुकी हैं और भीतरखाने क्लीन चिट की पटकथा लिखी जा रही है।
गोलक गबन कांड: क्या इतना आसान है भूल जाना?
यह वही मामला है जिसने न सिर्फ संस्था की साख को नुकसान पहुंचाया, बल्कि श्रद्धालुओं और आम जनता के विश्वास को भी गहरी ठेस पहुंचाई। गोलक जैसी पवित्र व्यवस्था से जुड़ा गबन कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि नैतिक और आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल सीईओ के बदलने से आरोपों की गंभीरता खत्म हो जाती है?


सीईओ आरिफ के आते ही सक्रिय हुआ ‘बहाली लॉबी’
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि सीईओ आरिफ के कार्यभार संभालते ही निलंबित कर्मचारियों के बीच एक अघोषित लॉबी सक्रिय हो गई है। फोन कॉल्स, सिफारिशें, पुराने संपर्क और राजनीतिक-सामाजिक दबाव—सब कुछ एक साथ हरकत में बताया जा रहा है।
कुछ निलंबित कर्मचारी तो यह दावा करने लगे हैं कि अब उन्हें “क्लीन चिट” मिलना तय है। यह दावा सिर्फ आत्मविश्वास नहीं, बल्कि भीतरू जानकारी या आश्वासन की ओर भी इशारा करता है। यदि ऐसा है, तो यह जांच प्रक्रिया पर सीधा हमला माना जाएगा।

चर्चा यह भी है कि नेसियो (या नई जांच/प्रशासनिक व्यवस्था) के आने को आधार बनाकर पुराने मामलों को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश हो सकती है। सवाल उठता है—
- क्या नई व्यवस्था का मतलब पुराने आरोपों से मुक्ति है?
- क्या जांच पूरी होने से पहले ही निलंबन हटाना नियमसम्मत है?
- क्या इससे यह संदेश नहीं जाएगा कि घोटाला करो, वक्त का इंतजार करो और फिर बहाल हो जाओ?
यदि ऐसा हुआ, तो यह न केवल संस्था के लिए घातक होगा, बल्कि भविष्य में भ्रष्टाचार को खुली छूट देने जैसा होगा।
जनता और श्रद्धालुओं के भरोसे से खिलवाड़ नहीं
गोलक से जुड़ा हर रुपया आस्था और विश्वास का प्रतीक है। ऐसे मामलों में जरा-सी ढील भारी जनाक्रोश को जन्म दे सकती है। जनता यह जानना चाहती है कि—
- जांच कहां तक पहुंची?
- दोषियों की पहचान हुई या नहीं?
- कार्रवाई क्यों लंबित है?
इन सवालों के जवाब दिए बिना यदि बहाली का रास्ता खोला गया, तो यह साफ तौर पर सिस्टम की विफलता मानी जाएगी।
स्पष्ट चेतावनी: बहाली नहीं, जवाबदेही चाहिए
यह खबर केवल सूचना नहीं, बल्कि स्पष्ट चेतावनी है। निलंबित कर्मचारियों की बहाली पर किसी भी स्तर पर विचार करना जांच से भागने के समान होगा। प्रशासन को याद रखना चाहिए कि कुर्सियां बदलती हैं, लेकिन फाइलों में दर्ज सच नहीं।
अब वक्त है कि सीईओ आरिफ अपने पहले ही फैसलों से यह संदेश दें कि वे शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति पर चलेंगे, न कि पुराने घोटालों को रफा-दफा करने पर।
यदि बहाली हुई, तो सवाल सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर उठेंगे—और तब जवाब देना मुश्किल होगा।
— जारी रहेगी नजर, जवाबदेही तय होकर रहेगी।



