उत्तराखंड में जंक फूड पर रोक की उठी मांग, राज्य मानवाधिकार आयोग पहुंची जनहित याचिका,, बच्चों में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हाई बीपी और अन्य बीमारियों का हवाला देकर SIT गठन व सख्त कार्रवाई की मांग,, स्कूलों के आसपास जंक फूड बिक्री पर नियंत्रण, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक और पोषण जागरूकता अभियान चलाने की भी की गई मांग,,

उत्तराखंड में जंक फूड पर रोक की उठी मांग, राज्य मानवाधिकार आयोग पहुंची जनहित याचिका,,
बच्चों में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हाई बीपी और अन्य बीमारियों का हवाला देकर SIT गठन व सख्त कार्रवाई की मांग,,
स्कूलों के आसपास जंक फूड बिक्री पर नियंत्रण, भ्रामक विज्ञापनों पर रोक और पोषण जागरूकता अभियान चलाने की भी की गई मांग,,


हरिद्वार। उत्तराखंड में बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य पर जंक फूड के बढ़ते दुष्प्रभाव को लेकर राज्य मानवाधिकार आयोग में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है। हरिद्वार के जगजीतपुर निवासी अरुण भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदोरिया एडवोकेट (पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह) तथा चेतन भदोरिया (एलएलबी अध्ययनरत) ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, देहरादून में अध्यक्ष के समक्ष याचिका दाखिल करते हुए प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य उत्तराखंड सरकार को पक्षकार बनाया है।
याचिकाकर्ताओं ने आयोग को दिए अपने प्रार्थना पत्र में कहा है कि राज्य में छोटे-छोटे बच्चों के बीच कैंसर, चक्कर आने की समस्या, कम उम्र में हार्ट अटैक, मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लीवर, दांतों की समय से पहले खराबी, पाचन संबंधी समस्याएं तथा पोषण की कमी जैसे गंभीर स्वास्थ्य संबंधी मामलों में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। उनका कहना है कि इन समस्याओं के पीछे जंक फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत (प्रोसेस्ड) खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है, जिसे गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।
याचिका में कहा गया है कि भारत में वर्ष 1990 के दशक के बाद आर्थिक उदारीकरण के साथ विदेशी फास्ट फूड संस्कृति का तेजी से विस्तार हुआ। इसके बाद बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज, हॉट डॉग और अन्य पश्चिमी शैली के फास्ट फूड का प्रचलन बढ़ा। हालांकि भारत में पहले से ही समोसा, कचौरी, पकोड़े, चाट, वड़ा पाव और भेलपुरी जैसे पारंपरिक त्वरित खाद्य पदार्थ मौजूद थे, लेकिन आधुनिक विदेशी फास्ट फूड संस्कृति ने बच्चों और युवाओं की खान-पान की आदतों को तेजी से प्रभावित किया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बच्चों द्वारा लगातार जंक फूड का अत्यधिक सेवन उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने इस विषय को केवल स्वास्थ्य का मामला नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य, बाल संरक्षण और गरिमापूर्ण जीवन के मानवाधिकार से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए आयोग से हस्तक्षेप की मांग की है।
याचिका में राज्य मानवाधिकार आयोग से अनुरोध किया गया है कि इस मामले को जनस्वास्थ्य एवं मानवाधिकार के दृष्टिकोण से स्वीकार करते हुए राज्य सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तथा अन्य संबंधित विभागों से विस्तृत प्रतिवेदन तलब किया जाए। साथ ही राज्य में बिक रहे जंक फूड की गुणवत्ता, मानकों और उसके प्रभाव की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की अनुशंसा की जाए ताकि आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
याचिका में बच्चों को लक्षित कर किए जाने वाले भ्रामक अथवा आक्रामक जंक फूड विज्ञापनों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। इसके अलावा स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के आसपास जंक फूड की बिक्री को नियंत्रित करने, खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर नमक, चीनी और वसा की मात्रा स्पष्ट एवं बड़े अक्षरों में प्रदर्शित करने तथा संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली को लेकर विद्यालयों में नियमित जागरूकता अभियान चलाने की भी अनुशंसा करने का आग्रह किया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने आयोग से यह भी मांग की है कि इस विषय पर विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर व्यापक अध्ययन कराया जाए, जिससे बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य पर जंक फूड के प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जा सके और उसके आधार पर भविष्य की नीति तैयार की जा सके।
याचिका में कहा गया है कि यह मुद्दा केवल किसी एक परिवार या क्षेत्र का नहीं बल्कि करोड़ों बच्चों और नागरिकों के वर्तमान और भविष्य के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा और अधिक बढ़ सकता है। इसलिए जनहित एवं मानवाधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से राज्य मानवाधिकार आयोग से आवश्यक हस्तक्षेप और राज्य सरकार को उपयुक्त दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है।
अब इस याचिका पर राज्य मानवाधिकार आयोग क्या रुख अपनाता है और राज्य सरकार को किस प्रकार के निर्देश या अनुशंसाएं जारी करता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि याचिका में बच्चों में विभिन्न बीमारियों और जंक फूड के बीच संबंध को लेकर जो दावे किए गए हैं, वे याचिकाकर्ताओं द्वारा आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं। इस संबंध में अंतिम निर्णय एवं आवश्यक कार्रवाई राज्य मानवाधिकार आयोग की सुनवाई और संबंधित विभागों की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।



