नेशनल इंटर कॉलेज धनौरी की 160 बीघा जमीन पर फिर गरमाया विवाद, हाईकोर्ट के आदेश के बाद डीएम को सौंपा अभ्यावेदन,, सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि के कथित अवैध विक्रय की जांच की मांग, नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने दस्तावेजों के साथ उठाए गंभीर सवाल,, प्रियांशु कम्बोज ने भूमि के रिकॉर्ड, बिक्री दस्तावेज, वित्तीय लेन-देन और अनुमतियों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की; हाईकोर्ट ने अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार निर्णय लेने की दी व्यवस्था

नेशनल इंटर कॉलेज धनौरी की 160 बीघा जमीन पर फिर गरमाया विवाद, हाईकोर्ट के आदेश के बाद डीएम को सौंपा अभ्यावेदन,,
सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि के कथित अवैध विक्रय की जांच की मांग, नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट ने दस्तावेजों के साथ उठाए गंभीर सवाल,,
प्रियांशु कम्बोज ने भूमि के रिकॉर्ड, बिक्री दस्तावेज, वित्तीय लेन-देन और अनुमतियों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की; हाईकोर्ट ने अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार निर्णय लेने की दी व्यवस्था
हरिद्वार। हरिद्वार के धनौरी स्थित बहुचर्चित नेशनल इंटर कॉलेज की करीब 160 बीघा सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि के कथित विक्रय का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। उत्तराखंड हाईकोर्ट के 4 अगस्त 2026 के आदेश के बाद प्रकरण में नई प्रशासनिक हलचल शुरू हो गई है। हाईकोर्ट के समक्ष दायर याचिका में उठाए गए मुद्दों के बाद अब नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट के सचिव प्रियांशु कम्बोज ने जिलाधिकारी हरिद्वार को विस्तृत अभ्यावेदन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई की मांग की है।
अभ्यावेदन के मुताबिक, ग्राम सभा शिवदासपुर उर्फ तेलीवाला की लगभग 10.4590 हेक्टेयर भूमि, करीब 160 बीघा के बराबर, नेशनल इंटर कॉलेज को शिक्षा एवं विद्यालय संचालन के सीमित सार्वजनिक उद्देश्य के लिए उपलब्ध कराई गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह भूमि सार्वजनिक शैक्षणिक उपयोग के लिए दी गई होने के बावजूद इसके हस्तांतरण अथवा विक्रय का प्रयास किया गया।
अभ्यावेदन में कॉलेज प्रबंधक आदेश कुमार सहित संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि भूमि के कथित विक्रय के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमतियां प्राप्त नहीं की गईं और कुछ दस्तावेजों एवं प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल हैं। साथ ही कथित तौर पर भूमि का सौदा वास्तविक बाजार मूल्य की तुलना में कम कीमत पर किए जाने से सार्वजनिक संपत्ति को आर्थिक नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।
शिकायत में भूमि विक्रय से जुड़े सभी राजस्व अभिलेख, बिक्री विलेख, अनुमतियां, प्रस्ताव, वित्तीय लेन-देन और संबंधित दस्तावेजों की गहन जांच कराने की मांग की गई है। इसके साथ ही पूरे मामले में कथित लाभार्थियों तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट के आदेश में क्या कहा गया?
मामले में पारित आदेश में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को जिलाधिकारी के समक्ष दो सप्ताह के भीतर अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है। आदेश के अनुसार, यदि ऐसा अभ्यावेदन दिया जाता है तो जिलाधिकारी को कानून के अनुसार छह माह के भीतर उस पर निर्णय लेना होगा। साथ ही जिन व्यक्तियों के निर्णय से प्रभावित होने की संभावना है, उन्हें आदेश पारित करने से पहले उचित सुनवाई का अवसर देने की बात भी कही गई है।
अदालत के समक्ष राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि प्रकरण से संबंधित वर्ष 2022 की एक एफआईआर थाना कलियर शरीफ में दर्ज है और मामला जांचाधीन है। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से सरकारी सहायता प्राप्त संस्था को आवंटित भूमि के कथित हस्तांतरण को गंभीर विषय बताया गया।
अब जिलाधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन पहुंचने के बाद निगाहें प्रशासनिक जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। शिकायतकर्ता की मांग है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो कथित भूमि विक्रय को निरस्त कर सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि को उसके मूल उद्देश्य के लिए सुरक्षित किया जाए और जिम्मेदार पाए जाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ लागू कानूनों के तहत आपराधिक, राजस्व एवं विभागीय कार्रवाई की जाए।
हालांकि, यह स्पष्ट है कि हाईकोर्ट के आदेश में आरोपों को सही ठहराने का कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है; अदालत ने मुख्य रूप से अभ्यावेदन प्रस्तुत करने और उस पर कानून के अनुसार निर्णय लेने की व्यवस्था की है।



