मनोज धनगर का बड़ा ब्यान,, मणिकर्णिका घाट की विरासत से छेड़छाड़ पर कड़ा विरोध,, लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की स्मृतियों को मिटाना घोर पाप : मनोज धनगर

इन्तजार रजा हरिद्वार- मनोज धनगर का बड़ा ब्यान,,
मणिकर्णिका घाट की विरासत से छेड़छाड़ पर कड़ा विरोध,,
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की स्मृतियों को मिटाना घोर पाप : मनोज धनगर

वाराणसी/बनारस। हरिद्वार
धार्मिक नगरी काशी में स्थित विश्वप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर विकास के नाम पर की जा रही कथित तोड़फोड़ और हस्तक्षेप को लेकर विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। इस मुद्दे पर अब सामाजिक और धार्मिक संगठनों के साथ-साथ विभिन्न समाजों के प्रतिनिधि भी खुलकर सामने आ गए हैं। ऑल इंडिया धनगर समाज महासभा, उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष मनोज धनगर ने मणिकर्णिका घाट की प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से छेड़छाड़ को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है।
मनोज धनगर ने कहा कि मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान घाट नहीं, बल्कि सनातन धर्म की जीवंत पहचान है। यह वह स्थान है, जहां जीवन और मृत्यु के दर्शन एक साथ होते हैं। सदियों से यह घाट मोक्ष की अवधारणा से जुड़ा रहा है और काशी की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है। ऐसे पवित्र और ऐतिहासिक स्थल को विकास के नाम पर बदलना आस्था के साथ सीधा खिलवाड़ है।
उन्होंने कहा कि मणिकर्णिका घाट की ऐतिहासिकता केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की अमूल्य स्मृतियां भी जुड़ी हैं। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने काशी सहित देशभर में अनेक मंदिरों, घाटों और तीर्थ स्थलों का संरक्षण और जीर्णोद्धार कराया था। उनके योगदान ने सनातन संस्कृति को नई ऊर्जा दी। ऐसे में उनके द्वारा संजोई गई विरासत को नष्ट करना इतिहास के साथ अन्याय है।
मनोज धनगर ने अपने बयान में कहा—
“बनारस में मणिकर्णिका घाट पर सदियों पुरानी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को ध्वस्त करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मणिकर्णिका घाट और इसकी प्राचीनता का धार्मिक महत्व तो है ही, इससे लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर जी की स्मृतियां भी जुड़ी हैं। विकास के नाम पर देश की धार्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों को मिटाना घोर पाप है। काशी की धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान मिटाने की ये साजिशें तत्काल बंद होनी चाहिए।”
उन्होंने यह भी कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो आस्था, इतिहास और संस्कृति को नुकसान पहुंचाए, वह स्वीकार्य नहीं हो सकता। काशी जैसे पवित्र नगर में हर निर्माण कार्य बेहद संवेदनशीलता और धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यदि बिना संवाद और सहमति के ऐसे फैसले लिए गए, तो जनभावनाएं आहत होंगी।
मनोज धनगर ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की कि मणिकर्णिका घाट सहित काशी की समस्त धार्मिक धरोहरों के संरक्षण के लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की गतिविधियां नहीं रुकीं, तो समाज को सड़क पर उतरकर विरोध करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का भी मानना है कि काशी की पहचान उसकी प्राचीनता और आध्यात्मिक विरासत से है। यदि यही नष्ट हो गई, तो काशी केवल ईंट-पत्थरों का शहर बनकर रह जाएगी। ऐसे में मणिकर्णिका घाट की रक्षा के लिए उठ रही आवाज अब और बुलंद होती नजर आ रही है।



