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देहरादून को मिला ‘एक्शन मोड’ वाला डीएम! IAS आशीष चौहान की एंट्री से बढ़ी उम्मीदें, फाइल नहीं फील्ड वाली कार्यशैली फिर चर्चा में,, “जनता दरबार नहीं, जनता के द्वार” — IIT से निकले IAS आशीष चौहान की पहचान जमीनी अफसर के रूप में, गांव-गांव जाकर समस्याएं सुनना बना उनकी कार्यशैली का हिस्सा,, “फर्जी कोविड रैकेट से लेकर जोशीमठ संकट तक, हर चुनौती में दिखाया दम” — टेक्नोलॉजी, सख्ती और संवेदनशील प्रशासन का मिश्रण माने जाते हैं आशीष चौहान,,

देहरादून को मिला ‘एक्शन मोड’ वाला डीएम! IAS आशीष चौहान की एंट्री से बढ़ी उम्मीदें, फाइल नहीं फील्ड वाली कार्यशैली फिर चर्चा में,,

“जनता दरबार नहीं, जनता के द्वार” — IIT से निकले IAS आशीष चौहान की पहचान जमीनी अफसर के रूप में, गांव-गांव जाकर समस्याएं सुनना बना उनकी कार्यशैली का हिस्सा,,

“फर्जी कोविड रैकेट से लेकर जोशीमठ संकट तक, हर चुनौती में दिखाया दम” — टेक्नोलॉजी, सख्ती और संवेदनशील प्रशासन का मिश्रण माने जाते हैं आशीष चौहान,,

देहरादून। उत्तराखंड प्रशासनिक गलियारों में एक बार फिर एक नाम तेजी से चर्चा में है—आईएएस आशीष चौहान। उत्तराखंड कैडर के 2012 बैच के अधिकारी आशीष चौहान को लेकर यह माना जाता है कि वे उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं, जो दफ्तर की फाइलों से अधिक जमीनी हकीकत पर भरोसा करते हैं। अब देहरादून जैसे संवेदनशील और राज्य की राजधानी जिले की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आने के बाद आम जनता के बीच नई उम्मीदें दिखाई देने लगी हैं।

आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने वाले आशीष चौहान ने यूपीएससी 2011 में ऑल इंडिया 89वीं रैंक हासिल कर प्रशासनिक सेवा में जगह बनाई। सिविल सेवा में आने से पहले उन्होंने कॉरपोरेट क्षेत्र में भी काम किया, लेकिन पहाड़ और समाज से जुड़ाव उन्हें उत्तराखंड तक ले आया। यही वजह है कि वे खुद को केवल अधिकारी नहीं बल्कि समाज से जुड़े व्यक्ति के रूप में पेश करते दिखाई देते हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि वे स्थानीय संस्कृति और भाषा से जुड़ाव रखते हैं तथा गढ़वाली बोलने में भी सहज माने जाते हैं।

आशीष चौहान की पहचान एक ऐसे अफसर की है जो “फाइल से ज्यादा फील्ड” के सिद्धांत पर चलते हैं। उनके प्रशासनिक कार्यकाल में कई ऐसे उदाहरण सामने आए, जिन्होंने उन्हें आम अधिकारियों से अलग पहचान दी। वर्ष 2022 में जब वे पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी थे, तब सुबह करीब छह बजे अचानक जिला अस्पताल पहुंचे। निरीक्षण में 11 डॉक्टर ड्यूटी से गायब मिले। मामले को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने तत्काल कार्रवाई कर सख्त संदेश दिया कि जनसेवा में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।

हरिद्वार में एडीएम रहते हुए कुंभ 2021 के दौरान चर्चित फर्जी कोविड टेस्ट रैकेट के खुलासे में भी उनकी भूमिका सुर्खियों में रही। इस कार्रवाई के बाद संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और प्रशासनिक सख्ती का संदेश गया।

उनकी कार्यशैली में तकनीक और पारंपरिक सोच का संतुलित मिश्रण दिखाई देता है। चमोली में “हिम-प्रहरी ऐप” लॉन्च कर उन्होंने स्थानीय युवाओं को मनरेगा और रोजगार गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की। वहीं सीमांत क्षेत्रों के विकास के लिए पिथौरागढ़ में “ऑपरेशन सीमांत सशक्तिकरण” चलाया गया, जिसके तहत चीन-नेपाल सीमा से जुड़े गांवों में पहली बार मोबाइल नेटवर्क, सड़क और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ।

टिहरी के डीएम रहते हुए उन्होंने जनता से सीधे जुड़ने की अनोखी पहल की। हर शनिवार किसी दूरस्थ गांव में चौपाल लगाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। ग्रामीणों का कहना था कि “डीएम साहब खुद हमारे गांव तक पहुंचे”, और यही जुड़ाव उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता गया।

संकट के समय मैदान में उतरना भी उनकी कार्यशैली की पहचान रहा है। जोशीमठ भू-धंसाव संकट के दौरान लगातार 72 घंटे जमीनी स्तर पर रहकर राहत और बचाव कार्यों की निगरानी करना उनकी प्रशासनिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसी तरह आदि कैलाश यात्रा को ऑनलाइन परमिट प्रणाली से जोड़कर पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने की कोशिश भी की गई।

टिहरी झील से जुड़े महिला समूहों को बढ़ावा देने से लेकर “मेरा गांव-मेरा देश” अभियान तक, उनकी कई पहलें रोजगार, पलायन रोकने और ग्रामीण विकास से जुड़ी रही हैं।

कुल मिलाकर देहरादून को ऐसे जिलाधिकारी मिले हैं जिनकी पहचान केवल प्रशासनिक सख्ती तक सीमित नहीं, बल्कि विकास, नवाचार और जनता से सीधे संवाद तक फैली हुई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि राजधानी देहरादून में आशीष चौहान किस तरह नए प्रयोग और जनहितकारी बदलावों को जमीन पर उतारते हैं।

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