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उत्तराखंड फार्मा इंडस्ट्री को मिला ‘क्वालिटी मंत्र! IPC के नए गुणवत्ता मानकों पर मंथन, दवा उद्योग को मिलेगी वैश्विक पहचान की नई उड़ान,, देश की 20 प्रतिशत दवाएं बनाने वाले उत्तराखंड में गुणवत्ता क्रांति की तैयारी; हरिद्वार में जुटे फार्मा उद्योग के दिग्गज, वैज्ञानिक और नियामक विशेषज्ञ,, आईपीसी सचिव डॉ. वी. कलाइसेल्वन, राज्य औषधि नियंत्रक ताजबर सिंह, वरिष्ठ ड्रग्स इंस्पेक्टर अनीता भारती, मेघा सिंह , हरीश सिंह और उद्योग प्रतिनिधियों ने दिया संदेश— गुणवत्ता, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानकों से ही मजबूत होगा भारतीय फार्मा सेक्टर,,

उत्तराखंड के फार्मा उद्योग के लिए यह सेमिनार केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि गुणवत्ता, विश्वास और वैश्विक पहचान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ, जिससे आने वाले वर्षों में प्रदेश की औद्योगिक प्रगति को नई गति मिलने की उम्मीद जताई

उत्तराखंड फार्मा इंडस्ट्री को मिला ‘क्वालिटी मंत्र! IPC के नए गुणवत्ता मानकों पर मंथन, दवा उद्योग को मिलेगी वैश्विक पहचान की नई उड़ान,,

देश की 20 प्रतिशत दवाएं बनाने वाले उत्तराखंड में गुणवत्ता क्रांति की तैयारी; हरिद्वार में जुटे फार्मा उद्योग के दिग्गज, वैज्ञानिक और नियामक विशेषज्ञ,,

आईपीसी सचिव डॉ. वी. कलाइसेल्वन, राज्य औषधि नियंत्रक ताजबर सिंह, वरिष्ठ ड्रग्स इंस्पेक्टर अनीता भारती, मेघा सिंह , हरीश सिंह और उद्योग प्रतिनिधियों ने दिया संदेश— गुणवत्ता, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानकों से ही मजबूत होगा भारतीय फार्मा सेक्टर,,

हरिद्वार। देश के प्रमुख फार्मा हब के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना चुके उत्तराखंड में दवा उद्योग को और अधिक प्रतिस्पर्धी, सुरक्षित तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में हरिद्वार में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली। एसोसिएशन ऑफ देवभूमि फार्मा इंडस्ट्रीज (एडीपीआई) के तत्वावधान में आयोजित एक विशेष सेमिनार में इंडियन फार्माकोपिया कमीशन (आईपीसी) के नवीनतम गुणवत्ता मानकों, नियामकीय प्रावधानों और फार्मा उद्योग के भविष्य पर व्यापक चर्चा की गई।

हरिद्वार में आयोजित इस सेमिनार में प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों हरिद्वार, रुड़की, देहरादून और रुद्रपुर से बड़ी संख्या में फार्मा उद्योगों के प्रतिनिधि, तकनीकी विशेषज्ञ, गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी तथा दवा निर्माण क्षेत्र से जुड़े पेशेवर शामिल हुए। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य उद्योग जगत को भारतीय औषध संहिता आयोग द्वारा समय-समय पर जारी किए जा रहे नए गुणवत्ता मानकों और नियामकीय बदलावों की जानकारी देना तथा उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करना रहा।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित भारतीय औषध संहिता आयोग (IPC) के सचिव-सह-वैज्ञानिक निदेशक डॉ. वी. कलाइसेल्वन ने कहा कि भारतीय औषध संहिता केवल एक तकनीकी दस्तावेज नहीं बल्कि देश में निर्मित और उपयोग की जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता का आधार है। उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में दवा उद्योग के सामने नई चुनौतियां और अवसर दोनों मौजूद हैं। ऐसे समय में गुणवत्ता मानकों का कड़ाई से अनुपालन ही भारतीय दवा उद्योग को विश्व बाजार में मजबूत स्थिति प्रदान कर सकता है।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया भारतीय दवाओं पर भरोसा कर रही है और इस भरोसे को बनाए रखने के लिए फार्मा उद्योगों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रत्येक उत्पाद में गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी। डॉ. कलाइसेल्वन ने उद्योग प्रतिनिधियों से आह्वान किया कि वे केवल नियामकीय अनुपालन तक सीमित न रहें बल्कि गुणवत्ता को अपनी कार्य संस्कृति का हिस्सा बनाएं।

सेमिनार में उपस्थित राज्य औषधि नियंत्रक एवं लाइसेंसिंग प्राधिकरण, उत्तराखंड के ताजबेर सिंह ने प्रदेश के फार्मा सेक्टर की उपलब्धियों और संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड आज देश के सबसे महत्वपूर्ण फार्मास्यूटिकल उत्पादन केंद्रों में शामिल हो चुका है। यहां स्थापित औद्योगिक इकाइयां न केवल देश की दवा आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

ताजबेर सिंह ने कहा कि नियामकीय मानकों का पालन उद्योगों के लिए बाध्यता नहीं बल्कि अवसर है। इससे उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता मजबूत होती है। उन्होंने उद्योग प्रतिनिधियों से गुणवत्ता नियंत्रण, दस्तावेजीकरण, परीक्षण प्रक्रियाओं और उत्पादन मानकों में लगातार सुधार करने का आग्रह किया।

कार्यक्रम में उद्योग जगत का प्रतिनिधित्व करते हुए एकम्स कंपनी के डायरेक्टर संदीप जैन ने कहा कि वर्तमान समय में तकनीकी बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं और ऐसे में उद्योगों को लगातार अपडेट रहना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एडीपीआई द्वारा आयोजित यह सेमिनार उद्योगों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होगा क्योंकि इससे नई तकनीकी जानकारियां, नियामकीय अपडेट और गुणवत्ता सुधार के व्यावहारिक पहलुओं को समझने का अवसर मिला है।

संदीप जैन ने कहा कि उत्तराखंड का फार्मा उद्योग केवल उत्पादन क्षमता के लिए ही नहीं बल्कि गुणवत्ता आधारित निर्माण के लिए भी जाना जाना चाहिए। इसके लिए उद्योग, नियामक संस्थाएं और वैज्ञानिक संगठन मिलकर कार्य कर रहे हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है।

सेमिनार के दौरान विशेषज्ञों ने दवा निर्माण प्रक्रिया में गुणवत्ता नियंत्रण, परीक्षण पद्धतियों, गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (GMP), औषधीय मानकों, नियामकीय अनुपालन तथा वैश्विक स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। उद्योग प्रतिनिधियों ने भी अपने अनुभव साझा किए और गुणवत्ता मानकों के अनुपालन में आने वाली चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड आज देश के सबसे महत्वपूर्ण फार्मा राज्यों में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में उपयोग होने वाली लगभग 20 प्रतिशत दवाओं का उत्पादन उत्तराखंड में किया जाता है। हरिद्वार, देहरादून, रुड़की और रुद्रपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में सैकड़ों फार्मा इकाइयां कार्यरत हैं, जो हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रही हैं।

ऐसे में इंडियन फार्माकोपिया कमीशन के नवीनतम मानकों पर आधारित यह सेमिनार उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उद्योग समय रहते गुणवत्ता आधारित उत्पादन और नियामकीय मानकों को पूरी गंभीरता से अपनाते हैं तो उत्तराखंड न केवल देश का बल्कि एशिया का भी एक प्रमुख फार्मा निर्माण केंद्र बन सकता है।

कार्यक्रम के अंत में एडीपीआई के पदाधिकारियों ने कहा कि भविष्य में भी उद्योग हित में ऐसे जागरूकता कार्यक्रम, तकनीकी कार्यशालाएं और विशेषज्ञ संवाद आयोजित किए जाते रहेंगे ताकि उत्तराखंड का फार्मा उद्योग गुणवत्ता, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सके।

उत्तराखंड के फार्मा उद्योग के लिए यह सेमिनार केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि गुणवत्ता, विश्वास और वैश्विक पहचान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ, जिससे आने वाले वर्षों में प्रदेश की औद्योगिक प्रगति को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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