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हजारा ग्रांट-धनौरी मार्ग बना ‘गड्ढों का गलियारा’, 40 गांवों के ग्रामीण बेहाल—‘सड़क नहीं तो वोट नहीं’ की हुंकार,, टूटी सड़क और जर्जर रपट ने बढ़ाई मुसीबत, मरीजों को अस्पताल पहुंचाना चुनौती; ज्वालापुर विधानसभा में विधायक-सांसद से गुहार के बावजूद समाधान नहीं होने का ग्रामीणों का आरोप

हजारा ग्रांट-धनौरी मार्ग बना ‘गड्ढों का गलियारा’, 40 गांवों के ग्रामीण बेहाल—‘सड़क नहीं तो वोट नहीं’ की हुंकार,,

टूटी सड़क और जर्जर रपट ने बढ़ाई मुसीबत, मरीजों को अस्पताल पहुंचाना चुनौती; ज्वालापुर विधानसभा में विधायक-सांसद से गुहार के बावजूद समाधान नहीं होने का ग्रामीणों का आरोप

हरिद्वार। ज्वालापुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम हजारा ग्रांट से धनौरी तक का मुख्य मार्ग इन दिनों बदहाली की ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जिस पर विकास के दावों को लेकर सवाल खड़े होना लाजिमी है। करीब 40 गांवों को जोड़ने वाला यह महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढों में तब्दील हो चुका है। सड़क की हालत इतनी खराब बताई जा रही है कि दोपहिया और चारपहिया वाहनों के साथ पैदल राहगीरों के लिए भी सफर जोखिम भरा हो गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यह मार्ग केवल आवागमन का रास्ता नहीं, बल्कि क्षेत्र के हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण संपर्क है। बावजूद इसके लंबे समय से सड़क की बदहाली पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।

टूटी रपट ने बढ़ाई परेशानी, मरीजों के लिए सफर बना संकट

ग्रामीणों के मुताबिक हजारा ग्रांट की रपट भी जर्जर हालत में है, जिसके कारण बरसात अथवा अन्य परिस्थितियों में आवागमन और मुश्किल हो जाता है। सबसे गंभीर स्थिति तब पैदा होती है जब किसी गांव में कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है या दुर्घटना जैसी आपात स्थिति सामने आती है। ग्रामीणों का आरोप है कि खराब सड़क के कारण मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में अनावश्यक समय लग जाता है और कई बार वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ता है।लोगों का सवाल है कि जब यह मार्ग इतने गांवों की आबादी को जोड़ता है तो इसकी स्थायी मरम्मत और रपट के पुनर्निर्माण को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही?

विधायक से सांसद तक गुहार, ग्रामीण बोले—अब आश्वासन नहीं, सड़क चाहिए

ग्रामीणों का दावा है कि सड़क की समस्या को लेकर वे स्थानीय विधायक से लेकर सांसद और संबंधित अधिकारियों तक अपनी आवाज पहुंचा चुके हैं। कई बार शिकायत और मांग के बावजूद उन्हें कथित तौर पर आश्वासन ही मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।

लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीण अब इसे महज सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का सवाल मान रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के दौरान नेताओं को गांव-गांव जाकर जनता की समस्याएं याद आती हैं, लेकिन चुनाव के बाद बुनियादी सुविधाओं के लिए जनता को कार्यालयों और जनप्रतिनिधियों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

इसी नाराजगी के बीच ग्रामीणों ने आगामी चुनावों को लेकर ‘सड़क नहीं तो वोट नहीं’ का नारा बुलंद किया है। ग्रामीणों का साफ कहना है—“जो सड़क बनवाएगा, वोट उसी को मिलेगा।”

सड़क पर सियासी सवाल—विकास के दावों की जमीनी परीक्षा

हजारा ग्रांट-धनौरी मार्ग की बदहाली अब स्थानीय स्तर पर राजनीतिक मुद्दा बनती दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनावी घोषणाओं और विकास के दावों के बीच यदि करीब 40 गांवों को जोड़ने वाली सड़क ही बदहाल रहे तो विकास की वास्तविक तस्वीर पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ग्रामीणों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से मांग की है कि सड़क का स्थलीय निरीक्षण कर तत्काल मरम्मत की कार्ययोजना तैयार की जाए तथा हजारा ग्रांट की जर्जर रपट का पुनर्निर्माण कराया जाए। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और चुनावी बहिष्कार जैसे कदमों पर विचार कर सकते हैं।

अब सवाल यही है कि 40 गांवों की आवाज कब सुनी जाएगी? सड़क कब गड्ढों से बाहर निकलेगी और जर्जर रपट कब दोबारा मजबूत संपर्क मार्ग का हिस्सा बनेगी—इस पर ग्रामीणों की निगाह प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के अगले कदम पर टिकी है।

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