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पंचायतीराज विभाग में अंदरूनी खींचतान या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का असर? शासन तक पहुंचा गोपनीय पत्र, उठे कई गंभीर सवाल,, झूठी शिकायतों, विभागीय दबाव और वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई का दावा; निष्पक्ष जांच की मांग के साथ शासन को भेजा गया विस्तृत प्रतिवेदन,, जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों में अधिकारी की कार्यशैली की चर्चा; पंचायत भवन, मिनी सचिवालय और विकास कार्यों को बताया पारदर्शिता अभियान का हिस्सा,,

पंचायतीराज विभाग में अंदरूनी खींचतान या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का असर? शासन तक पहुंचा गोपनीय पत्र, उठे कई गंभीर सवाल,,

झूठी शिकायतों, विभागीय दबाव और वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई का दावा; निष्पक्ष जांच की मांग के साथ शासन को भेजा गया विस्तृत प्रतिवेदन,,

जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों में अधिकारी की कार्यशैली की चर्चा; पंचायत भवन, मिनी सचिवालय और विकास कार्यों को बताया पारदर्शिता अभियान का हिस्सा,,

हरिद्वार। जनपद हरिद्वार के पंचायतीराज विभाग में इन दिनों प्रशासनिक गतिविधियां और विभागीय घटनाक्रम चर्चा का विषय बने हुए हैं। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा शासन को भेजे गए गोपनीय प्रतिवेदन में कई गंभीर मुद्दों का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि पंचायत स्तर पर वित्तीय पारदर्शिता, विकास कार्यों की गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयासों के चलते उनके खिलाफ लगातार झूठी और आधारहीन शिकायतें कराई जा रही हैं।

प्रतिवेदन में कहा गया है कि विभागीय स्तर पर सरकारी धन के उपयोग, पंचायत विकास कार्यों की निगरानी और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। कुछ मामलों में वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही के आरोपों की जांच कर कार्रवाई भी की गई, जिसके बाद कथित रूप से असंतुष्ट पक्षों द्वारा विभिन्न माध्यमों से शिकायतें भेजी जाने लगीं।

गोपनीय पत्र में ऑडिट आपत्तियों, विभागीय जांचों और पंचायत विकास कार्यों से जुड़े कई दस्तावेजों का भी उल्लेख किया गया है। अधिकारी का दावा है कि अधिकांश निर्णय उपलब्ध अभिलेखों, जांच रिपोर्टों और वित्तीय नियमों के अनुरूप लिए गए हैं तथा सभी कार्यों में पारदर्शिता बनाए रखने का प्रयास किया गया है।

प्रतिवेदन में पंचायत भवनों के आधुनिकीकरण, डिजिटल सुविधाओं के विस्तार तथा ग्रामीण क्षेत्रों में मिनी सचिवालयों के निर्माण जैसे कार्यों को विशेष उपलब्धि बताया गया है। इसके समर्थन में विभिन्न विकास कार्यों के दस्तावेज और फोटोग्राफ भी संलग्न किए गए हैं। दावा किया गया है कि इन पहलों से ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सेवाएं अधिक सुलभ हुई हैं।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, जनसामान्य और अनेक पंचायत प्रतिनिधियों के बीच संबंधित अधिकारी की छवि एक सक्रिय और तेज-तर्रार अधिकारी के रूप में मानी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत भवनों के विकास, कार्यालय व्यवस्थाओं में सुधार और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर भी उनकी कार्यशैली की चर्चा होती रही है। हालांकि विभाग के भीतर चल रही शिकायतों और प्रतिशिकायतों ने पूरे मामले को और अधिक चर्चा में ला दिया है।

प्रतिवेदन में शासन से अनुरोध किया गया है कि यदि किसी प्रकार की शिकायत प्राप्त होती है तो उसकी निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके। साथ ही बिना पर्याप्त साक्ष्यों के किसी निष्कर्ष पर न पहुंचने की भी बात कही गई है।

फिलहाल पूरे मामले ने पंचायतीराज विभाग में हलचल बढ़ा दी है। अब सभी की निगाहें शासन स्तर पर संभावित जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। यदि जांच होती है तो इससे न केवल शिकायतों की वास्तविकता स्पष्ट होगी, बल्कि पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चल रही बहस को भी नई दिशा मिल सकती है।

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